UBS के एनालिस्ट नवीन किल्ला का मानना है कि अब '10-मिनट डिलीवरी' कोई खास बात नहीं, बल्कि एक सामान्य सर्विस स्टैंडर्ड बन गई है। रिटेल कंपनियां अब इलेक्ट्रॉनिक्स और फैशन जैसी नई कैटेगरी में विस्तार कर रही हैं ताकि ग्राहकों का बड़ा मार्केट शेयर हासिल किया जा सके।
भारतीय रिटेल सेक्टर में अब 10 से 15 मिनट में ग्रोसरी डिलीवरी की जंग एक नए मोड़ पर है। UBS के लीड एनालिस्ट नवीन किल्ला के अनुसार, अब यह सेवा ग्राहकों के लिए 'स्टैंडर्ड सर्विस' हो गई है। इसका मतलब यह है कि कंपनियां अब केवल स्पीड के दम पर मार्केट में खुद को अलग नहीं दिखा सकतीं।
रिटेल मॉडल में आया बड़ा बदलाव
अब ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स के बीच का अंतर धुंधला पड़ता जा रहा है। बड़ी ऑनलाइन रिटेल कंपनियां अपनी लॉजिस्टिक्स को तेज करने में जुटी हैं, वहीं क्विक कॉमर्स कंपनियां इलेक्ट्रॉनिक्स, अपैरल और पर्सनल केयर जैसे प्रोडक्ट्स को अपने कैटलॉग में जोड़ रही हैं। अब कंपनियां 'मल्टी-टियर वेयरहाउस' नेटवर्क बना रही हैं, जिसमें छोटे 'डार्क स्टोर्स' के साथ-साथ बड़े रीजनल सेंटर भी शामिल हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
कंपनियों का मुख्य लक्ष्य है- ग्राहकों के खर्च का बड़ा हिस्सा अपनी जेब में डालना। UBS का अनुमान है कि भारतीय ऑनलाइन रिटेल मार्केट $200 बिलियन (करीब ₹16.7 लाख करोड़) तक पहुंच सकता है, हालांकि अभी भी 70% रेवेन्यू देश के टॉप 15 से 20 शहरों से ही आता है।
चुनौतियां और जोखिम
ग्रोसरी के अलावा नए सामान बेचने की होड़ में कंपनियां अपने प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव झेल सकती हैं। कॉम्प्लेक्स लॉजिस्टिक नेटवर्क को मैनेज करना काफी महंगा साबित हो सकता है। आने वाले समय में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के जरिए ग्राहकों की पसंद को समझना ही जीत की असली चाबी होगी। निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां अपने बढ़ते विस्तार और ऑपरेटिंग कॉस्ट के बीच बैलेंस कैसे बनाती हैं।
