भारत का सेमीकंडक्टर मार्केट **2030** तक **$117 अरब** तक पहुंचने की राह पर है। लेकिन अब असली चुनौती सिर्फ प्लांट बनाने की नहीं, बल्कि प्रोडक्शन क्वालिटी और ग्लोबल क्लाइंट्स का भरोसा जीतने की है।
भारत का सेमीकंडक्टर मिशन अब घोषणाओं के दौर से निकलकर असल काम (Operational Execution) की ओर बढ़ रहा है। मौजूदा समय में $18 अरब से ज्यादा के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है, लेकिन आने वाले 3 से 5 साल तक निवेशकों की नजर केवल प्रोजेक्ट की डेडलाइन पर नहीं, बल्कि तकनीकी बेंचमार्क पर होनी चाहिए।
बाजार की बड़ी तस्वीर
अनुमान है कि घरेलू सेमीकंडक्टर मार्केट 2025 में $56 अरब से बढ़कर 2030 तक $117 अरब के पार निकल जाएगा। हालांकि, सिर्फ फैब्रिकेशन प्लांट (Fab) बनाना काफी नहीं है। असली चुनौती 'प्रोसेस स्टेबिलाइजेशन' और 'कस्टमर क्वालिफिकेशन' की है। जब तक कोई यूनिट ग्लोबल स्टैंडर्ड के मुताबिक एरर-फ्री चिप्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू नहीं करती, तब तक मुनाफा मुश्किल है।
कौन से सेक्टर कमाएंगे सबसे पहले?
भले ही चिप बनाने वाली कंपनियों को मुनाफे में आने में वक्त लगे, लेकिन सहायक सेक्टर (Ancillary Industries) के लिए मौका अभी से बन रहा है। इंडस्ट्रियल कंस्ट्रक्शन, क्लीनरूम सेटअप, स्पेशलाइज्ड केमिकल और यूटिलिटी सपोर्ट देने वाली कंपनियां इस इकोसिस्टम के शुरुआती फायदे उठाएंगी।
जोखिम और निगरानी
सेमीकंडक्टर बिजनेस बेहद 'कैपिटल-इंटेंसिव' है और इसमें पैसा वापस आने में समय लगता है। पानी और बिजली की निरंतर आपूर्ति, टैलेंट की उपलब्धता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में जगह बनाना बड़ी चुनौतियां हैं। निवेशकों को अब केवल खबरों पर नहीं, बल्कि ट्रायल प्रोडक्शन और ग्लोबल सर्टिफिकेशन पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेंगे कि भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में कितनी मजबूती से टिक पाएंगी।
