ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड की कीमतें **$100** प्रति बैरल के पार जाने और यूएस ट्रेजरी यील्ड के **5%** के करीब पहुंचने से भारतीय बाजारों में शॉर्ट-टर्म अस्थिरता बढ़ गई है। इसका सीधा असर कंपनियों की कॉस्ट और मार्जिन पर पड़ रहा है।
भारतीय शेयर बाजार फिलहाल एक अनिश्चित दौर से गुजर रहा है। बाजार के जानकारों, जैसे बजाज एसेट मैनेजमेंट के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर निमेश चंदन के अनुसार, ग्लोबल स्तर पर बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें और यूएस ट्रेजरी यील्ड्स में उछाल घरेलू रिटर्न पर दबाव डाल रहे हैं।
तेल और यील्ड का डबल अटैक
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई का खतरा बढ़ता है, जो भारत जैसे आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। इससे न केवल राजकोषीय स्थिति (fiscal position) पर असर पड़ता है, बल्कि रुपया भी कमजोर होता है। साथ ही, 5% की उच्च यूएस ट्रेजरी यील्ड वैश्विक स्तर पर कर्ज को महंगा बना देती है, जिससे इमर्जिंग मार्केट के मुकाबले अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं।
किन सेक्टर्स पर है सबसे ज्यादा रिस्क?
पेंट्स, केमिकल्स, एविएशन और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर्स, जो ईंधन पर अधिक निर्भर हैं, उनके प्रॉफिट मार्जिन पर तगड़ा दबाव देखने को मिल सकता है। इन कंपनियों के लिए अपनी बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डालना आसान नहीं होगा। वहीं दूसरी ओर, टेक्सटाइल और फार्मा जैसे एक्सपोर्ट ओरिएंटेड सेक्टर्स को कमजोर रुपये से कुछ राहत मिल सकती है।
आगे की राह क्या है?
बाजार का भविष्य अब कंपनियों के अर्निंग ग्रोथ पर टिका है। यदि भारतीय कंपनियां इस कठिन माहौल में भी अपने मार्जिन को मैनेज करने में कामयाब रहती हैं, तो लॉन्ग-टर्म में स्थिति बेहतर हो सकती है। फिलहाल, निवेशकों की नजर ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी और क्रूड की चाल पर टिकी है।
