First Global की Devina Mehra ने बाजार की 'एफिशिएंसी' पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने George Soros की 'रिफ्लेक्सिविटी थ्योरी' का हवाला देते हुए चेताया है कि AI जैसे सेक्टर में फीडबैक लूप से कमजोर फंडामेंटल छिप रहे हैं, जो बाद में भारी गिरावट का कारण बन सकते हैं।
बाजार की हकीकत और रिफ्लेक्सिविटी
First Global की फाउंडर Devina Mehra का मानना है कि 'एफिशिएंट मार्केट हाइपोथिसिस' केवल किताबों तक सीमित है। हकीकत में बाजार अक्सर लॉजिक नहीं, बल्कि सिस्टमिक डिस्टॉर्शन (Systemic Distortions) से चलते हैं। इसके पीछे उन्होंने जॉर्ज सोरोस की 'रिफ्लेक्सिविटी थ्योरी' को मुख्य वजह बताया है।
इस थ्योरी के मुताबिक, शेयर की कीमत और बिजनेस फंडामेंटल का रिश्ता एकतरफा नहीं होता। जब किसी कंपनी का शेयर बढ़ता है, तो उसे सस्ता कैपिटल मिलता है। उस पैसे से कंपनी ग्रोथ करती है, जिससे मुनाफा बढ़ता है और शेयर की कीमत और ऊपर जाती है। यह एक ऐसा लूप है जो कई बार वैल्युएशन को असल कमाई की क्षमता से बहुत दूर ले जाता है।
AI सेक्टर पर मंडराता खतरा
Mehra ने वर्तमान में AI सेक्टर में चल रही होड़ को इसी थ्योरी से जोड़ा है। बड़ी मात्रा में कैपिटल AI प्रोजेक्ट्स में झोंका जा रहा है, जो कई बार सस्टेनेबल कमाई के बजाय केवल मार्केट 'हाइप' पर टिका है। यदि कंपनियां फाइनेंशियल हेल्थ के बजाय केवल मोमेंटम बनाए रखने पर जोर देंगी, तो यह स्ट्रक्चर बहुत नाजुक हो जाएगा।
इतिहास से सीख
बाजार का यह 'क्रेडिट-फ्यूल्ड' चक्र जब टूटता है, तो नतीजे काफी गंभीर होते हैं। उदाहरण के तौर पर, 2008 से 2009 के बीच BSE Sensex में लगभग 61% की गिरावट आई थी, जो अत्यधिक आशावाद (Optimism) से पैनिक में बदलने का एक बड़ा उदाहरण था।
निवेशकों के लिए सलाह
Mehra ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे सिर्फ प्राइस ट्रेंड न देखें। निवेश से पहले कंपनी का डेट लेवल, कैश फ्लो और क्या उनकी कमाई का ग्रोथ उनके खर्चों के साथ तालमेल बिठा पा रही है, इन बातों पर बारीकी से नजर रखें। जब बाजार की चाल बिजनेस के फैसले तय करने लगे, तो समझ जाइए कि सुधार (Correction) का खतरा बढ़ गया है।
