Crisil Report: भारत में हर तीसरी कॉर्पोरेट डील फेल, निवेशकों के लिए बड़ा अलर्ट

RESEARCH-REPORTS
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
Crisil Report: भारत में हर तीसरी कॉर्पोरेट डील फेल, निवेशकों के लिए बड़ा अलर्ट

Crisil की एक नई रिपोर्ट ने बाजार को चौंकाया है। इसके मुताबिक, **₹500 करोड़** से बड़ी हर तीसरी भारतीय कॉर्पोरेट डील अपने प्रदर्शन लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही है। साल **2017** के बाद से M&A गतिविधियों में तो तेजी आई है, लेकिन सही तालमेल न बैठना और रेगुलेटरी बाधाएं वैल्यू क्रिएशन में बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

भारतीय कंपनियां पिछले कुछ समय से आक्रामक तरीके से अधिग्रहण (Acquisitions) कर रही हैं और 2017 के बाद से डील वॉल्यूम दोगुना हो चुका है। हालांकि, क्रेडिट रेटिंग एजेंसी Crisil की ताजा एनालिसिस शेयरधारकों के लिए एक चेतावनी है। एजेंसी ने ₹500 करोड़ से अधिक मूल्य वाली 600 बड़ी डील्स की जांच की और पाया कि लगभग 33% अधिग्रहण उम्मीदों के मुताबिक नतीजे देने में विफल रहे।

क्यों फेल हो रही हैं कंपनियां?

निवेशकों को यह समझना होगा कि सिर्फ 'स्ट्रैटेजिक इंटेंट' यानी विस्तार की मंशा से किया गया निवेश मुनाफे की गारंटी नहीं है। जब कोई कंपनी बड़ी डील की घोषणा करती है, तो मार्केट में उत्साह तो होता है, लेकिन दो अलग-अलग बिजनेस कल्चर को एक साथ जोड़ना (Integration) कागजों पर दिखने से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है।

अलग-अलग सेक्टर, अलग चुनौतियां

  • फार्मा और टेक्नोलॉजी: यहां कंपनियां मुख्य रूप से इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और एआई क्षमताएं हासिल करने के लिए डील करती हैं। ऐसी 'इनटेंजिबल एसेट्स' को मिलाना शारीरिक संपत्तियों से कहीं ज्यादा कठिन होता है।
  • सीमेंट और मेटल: यहां कंपनियां नई कैपेसिटी बनाने में लगने वाले लंबे समय से बचने के लिए शॉर्टकट के तौर पर अधिग्रहण करती हैं।

क्या है रिपोर्ट का निचोड़?

Crisil के अनुसार, खराब प्रदर्शन की मुख्य वजह 'एग्जीक्यूशन' में कमी है। रेगुलेटरी देरी और कल्चरल मिसमैच की वजह से उम्मीद के मुताबिक सिनर्जी (Synergies) नहीं मिल पाती। हालांकि, राहत की बात यह है कि क्रेडिट आउटलुक स्टेबल है। कर्ज लेकर की गई 66% डील्स उम्मीदों पर खरी उतरी हैं और अधिकतर कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग या तो बरकरार रही है या उसमें सुधार हुआ है, जो दिखाता है कि कंपनियां अनुशासन के साथ कर्ज संभाल रही हैं।

निवेशकों के लिए सलाह

अब जब भी कोई कंपनी नई डील का एलान करे, तो सिर्फ ग्रोथ प्रोजेक्शन न देखें। मैनेजमेंट का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड, डील के लिए लिया गया कर्ज और रेगुलेटरी क्लीयरेंस पर नजर रखें। किसी भी डील की असली परीक्षा साइन करने के दिन नहीं, बल्कि अगले 18 से 24 महीनों में होती है कि कंपनी कैसे उसे एग्जीक्यूट करती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.