भारतीय कंपनियां अब खुद बिजनेस खड़ा करने के बजाय उन्हें खरीदना ज्यादा पसंद कर रही हैं। CRISIL की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस बढ़ते M&A ट्रेंड के बावजूद **75%** कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग स्थिर बनी हुई है, जो एक मजबूत आर्थिक अनुशासन की ओर इशारा करता है।
तेजी से बढ़ रहा है M&A का चलन
फाइनेंशियल ईयर 2017 के बाद से भारत में कंपनियों द्वारा दूसरी कंपनियों को खरीदने (Mergers & Acquisitions) का वॉल्यूम दोगुना से अधिक हो चुका है। टेक्नोलॉजी, फार्मास्युटिकल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी सेक्टर की दिग्गज कंपनियां अब टैलेंट और पेटेंट तक पहुंच बनाने के लिए एक्विजिशन का सहारा ले रही हैं। वहीं, सीमेंट और मेटल जैसी इंडस्ट्रीज अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए बड़े कंसोलिडेशन पर फोकस कर रही हैं।
कर्ज का प्रबंधन और मजबूती
कंपनी के कर्ज को समझने का सबसे सरल पैमाना है Net debt-to-EBITDA रेशियो। भारत की रेटेड कंपनियों के लिए यह आंकड़ा 2017 में 2.4 गुना था, जो अब सुधरकर 1.3 गुना के करीब आ गया है। इस कम कर्ज के बोझ के कारण कंपनियां अपना विस्तार सुरक्षित तरीके से कर पा रही हैं और करीब 60% कंपनियां समय पर अपना कर्ज चुकाने में भी सफल रही हैं।
रिस्क कहां है?
CRISIL की रिपोर्ट में 100 बड़े कर्ज-आधारित सौदों का विश्लेषण किया गया, जिसमें से करीब एक-तिहाई सौदे अपने व्यावसायिक लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रहे। इसके पीछे मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:
- इंटीग्रेशन चुनौतियां: लगभग 50% विफल सौदों की मुख्य वजह कल्चर और ऑपरेशंस को आपस में मर्ज करने में आई मुश्किल रही।
- रेगुलेटरी अड़चनें: लगभग 20% मामलों में सरकारी नियम और कानूनी देरी बाधा बनी।
- क्रॉस-बॉर्डर जटिलता: विदेशी कंपनियों को खरीदने में आई जटिलताओं ने भी करीब 20% सौदों के प्रदर्शन पर असर डाला।
निवेशकों के लिए सीख यही है कि केवल 'एक्विजिशन' की खबर पर न जाएं। कंपनी किस तरह से नई इकाई को अपने साथ जोड़ती है (Synergy) और मैनेजमेंट कर्ज चुकाने की क्या योजना रखता है, उस पर नजर रखना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
