कॉर्पोरेट प्रॉफिट के आंकड़ों के पीछे का सच हमेशा वैसा नहीं होता जैसा दिखता है। कई बार कंपनियां अपने अकाउंटिंग पॉलिसी में बदलाव कर मुनाफे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं, इसलिए निवेशकों को 'Notes to Accounts' पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
आमतौर पर निवेशक किसी भी कंपनी की सेहत का अंदाजा उसके 'नेट प्रॉफिट' के आंकड़ों से लगाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये आंकड़े उतने पारदर्शी नहीं होते जितने दिखते हैं? कई कंपनियां अपनी अकाउंटिंग पॉलिसी में मामूली बदलाव करके पेपर पर मुनाफा बढ़ा लेती हैं, जबकि असल बिजनेस में कोई सुधार नहीं होता।
अकाउंटिंग की चालाकी (Accounting Flexibility)
भारत में कंपनियां इंड AS (Indian Accounting Standards) और Companies Act, 2013 के नियमों के तहत काम करती हैं। हालांकि, मैनेजमेंट के पास अनुमान लगाने की काफी आजादी होती है। उदाहरण के तौर पर, मशीनों की 'डेप्रिसिएशन' (Depreciation) कैलकुलेट करने के तरीके में बदलाव करके कंपनी अपना खर्च कम दिखा सकती है। जब डेप्रिसिएशन का मेथड WDV से SLM किया जाता है, तो कंपनी का नेट प्रॉफिट रातों-रात बढ़ जाता है, जबकि कंपनी की कैश फ्लो या कामकाज की क्षमता में कोई बदलाव नहीं हुआ होता।
ऑडिटर के संकेतों को कैसे समझें?
ICAI के नियमों के मुताबिक, लिस्टेड कंपनियों के ऑडिटर्स को अपनी रिपोर्ट में 'Key Audit Matters' (KAM) का जिक्र करना होता है। इसमें उन क्षेत्रों की जानकारी होती है जहाँ मैनेजमेंट ने अपने विवेक का इस्तेमाल किया है। निवेशकों को रिपोर्ट में 'Emphasis of Matter' पैराग्राफ भी जरूर पढ़ने चाहिए। ये पैराग्राफ सीधे तौर पर कोई शिकायत नहीं करते, लेकिन ये उन जोखिमों की तरफ इशारा करते हैं जो भविष्य में कंपनी के लिए मुसीबत बन सकते हैं, जैसे कि कानूनी विवाद या एसेट वैल्यूएशन में अनिश्चितता।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
महज हेडलाइन नंबर देखकर निवेश का फैसला न लें। एनुअल रिपोर्ट के 'Notes to Accounts' सेक्शन में जाकर देखें कि क्या कंपनी ने अपनी अकाउंटिंग पॉलिसी बदली है? अगर पिछले साल के मुकाबले इस साल डेप्रिसिएशन या रेवेन्यू रिकग्निशन के तरीके में बदलाव हुआ है, तो यह खतरे की घंटी हो सकती है। हमेशा यह जांचें कि क्या प्रॉफिट की बढ़ोतरी असली बिजनेस ग्रोथ से आई है, या बस अकाउंटिंग की हेराफेरी से।
