'क्यों कर रहा है Geojit भरोसा?
Geojit Securities का कहना है कि भारतीय सोलर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब सिर्फ कैपेसिटी बढ़ाने से आगे बढ़कर वर्टिकल इंटीग्रेशन (Vertical Integration) और डायवर्सिफाइड बिजनेस मॉडल की ओर बढ़ रहा है। इसी स्ट्रैटेजिक बदलाव पर दांव लगाते हुए उन्होंने Waaree Energies और Premier Energies पर 'Buy' रेटिंग दी है।
ब्रोकरेज के टारगेट और वैल्यूएशन
Geojit ने Waaree Energies के लिए ₹3,650 का टारगेट प्राइस सेट किया है, जो मौजूदा भाव से 18% की तेजी का संकेत है। वहीं, Premier Energies के लिए ₹1,066 का लक्ष्य रखा गया है, यानी 20% का अपसाइड। ब्रोकरेज फर्म ने Sum-of-the-Parts (SOTP) वैल्यूएशन मेथड का इस्तेमाल किया है। Waaree के कोर बिजनेस को 10 गुना FY28 के अनुमानित EBITDA पर वैल्यू किया गया है, जबकि BESS, ग्रीन हाइड्रोजन और रिन्यूएबल इंफ्रास्ट्रक्चर सेगमेंट को डिस्काउंटेड कैश फ्लो और प्राइस-टू-बुक मल्टीपल पर आंका गया है। Premier Energies के सोलर मैन्युफैक्चरिंग पर 12.0x FY28E EV/EBITDA मल्टीपल लगाया गया है। ये वैल्यूएशन मार्जिन नॉर्मलाइजेशन और बढ़ी हुई एक्सपेंशन कॉस्ट को ध्यान में रखकर तय किए गए हैं।
इंडस्ट्री का फ्रंट और कंपनियों की पोजीशन
फिलहाल, Waaree Energies का मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹88,000 करोड़ है और यह 27x P/E पर ट्रेड कर रहा है। Premier Energies की वैल्यूएशन करीब ₹40,000 करोड़ है और यह 30x P/E के आसपास है।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल और डोमेस्टिक सोलर मॉड्यूल कैपेसिटी में तेजी से हो रहे इजाफे के कारण सप्लाई में ओवरकैपेसिटी (Oversupply) का स्ट्रक्चरल इशू है, जो FY28 तक 215-220 GWp तक पहुँच सकता है, जबकि डोमेस्टिक डिमांड केवल 50-55 GW रहने का अनुमान है। इस ओवरसप्लाई से दाम कम हो सकते हैं और इंडस्ट्री के प्रॉफिट पर दबाव आ सकता है।
हालांकि, ऐसे माहौल में Waaree और Premier जैसी इंटीग्रेटेड कंपनियां बेहतर पोजीशन में हैं। ये लागत नियंत्रण (Cost Control) और वेफर्स (Wafers) व सेल्स (Cells) जैसे अपस्ट्रीम सेगमेंट के साथ-साथ स्टोरेज और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे नए क्षेत्रों में डायवर्सिफिकेशन के जरिए इन दबावों से निपटने में सक्षम हो सकती हैं।
पॉलिसी का सपोर्ट और ग्लोबल फैक्टर
भारत सरकार के प्रोजेक्ट्स के लिए जून 2026 से मैंडेटरी डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट (DCR) और जून 2026 से सेल्स के लिए ALMM का विस्तार, sowie जून 2028 से वेफर्स को भी शामिल करने के प्रस्तावित नियम, घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करने के बड़े कदम हैं। इन नियमों से DCR मॉड्यूल को नॉन-DCR मॉड्यूल पर प्रीमियम मिल सकता है।
इसके अलावा, अप्रैल 2026 से चीन का एक्सपोर्ट VAT रिबेट वापस लेना और भारत की सोलर ग्लास पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी भी ग्लोबल कॉस्ट को जटिल बना रही है।
मंदी वाली राय: वैल्यूएशन और रिस्क
Geojit की उम्मीदों के विपरीत, कुछ अन्य एनालिस्ट का नजरिया थोड़ा अलग है। अप्रैल 2025 में, Bernstein SocGen ने दोनों कंपनियों पर 'Underperform' रेटिंग दी थी। उनका तर्क है कि भारतीय सोलर पैनल ग्लोबल बेंचमार्क से 2-3 गुना महंगे हो सकते हैं, जिससे लॉन्ग-टर्म कॉस्ट एडवांटेज पर सवाल खड़े होते हैं।
Bernstein का यह भी मानना है कि Waaree और Premier, Reliance Industries और Adani Enterprises जैसे बड़े खिलाड़ियों से मुकाबला करने में संघर्ष कर सकते हैं, जिनके पास ज्यादा वित्तीय ताकत और बैकवर्ड इंटीग्रेशन है।
सबसे बड़ा कंसर्न (Concern) मौजूदा प्रॉफिट मार्जिन की सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) को लेकर है। Geojit ने भी इन्हें 'असाधारण रूप से ऊंचा' बताया है और उम्मीद की है कि ये मिड-टीन लेवल पर नॉर्मलाइज होंगे। कंपनियों का आक्रामक कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) भी बैलेंस शीट पर दबाव डाल सकता है, अगर यूटिलाइजेशन रेट्स (Utilization Rates) एफिशिएंटली नहीं सुधरते।
Waaree के हालिया Q4 FY25 के मजबूत नतीजों के बावजूद, Bernstein का मानना है कि ऐसा परफॉरमेंस बनाए रखना मुश्किल होगा। Premier Energies का 30x और Waaree का 27x P/E रेश्यो इन रिस्क को देखते हुए थोड़ा ज्यादा लगता है।
आगे क्या?
भारतीय सोलर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आगे और कंसॉलिडेशन (Consolidation) देखने की उम्मीद है। जहां पॉलिसी सपोर्ट रिन्यूएबल एनर्जी टारगेट्स के लिए मजबूत है, वहीं कंपनियों को ओवरसप्लाई और आक्रामक स्पेंडिंग साइकिल को मैनेज करना होगा।
March 2026 तक, Motilal Oswal ने Waaree (₹3,514 टारगेट) और Premier Energies (₹1,000 टारगेट) दोनों पर 'Buy' रेटिंग बरकरार रखी है। वहीं, February 2026 में Nomura ने Waaree पर 'Buy' और Premier पर 'Neutral' की राय दी थी।
Waaree के ₹3,900 करोड़ के ग्लास प्लांट कैपेक्स और Waaree Transpower में बढ़ी हिस्सेदारी, साथ ही Premier Energies के हालिया पॉजिटिव क्वार्टरली नतीजों के बावजूद, वैल्यूएशन और इंडस्ट्री के स्ट्रक्चरल इश्यूज पर एनालिस्ट्स की चिंता बनी हुई है।