उत्तर प्रदेश रूफटॉप सोलर के मामले में देश का अग्रणी राज्य बन गया है। जुलाई 2026 तक यहां **1,02,000** से ज़्यादा सोलर इंस्टॉलेशन हो चुके हैं। सरकारी सब्सिडी का फायदा उठाकर लोग बिजली का बिल कम कर रहे हैं, लेकिन कमर्शियल सेक्टर और ग्रामीण इलाकों में अभी भी चुनौतियां हैं।
यूपी बना सोलर हब: 1 लाख पार हुए इंस्टॉलेशन
उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। राज्य सरकार ने जुलाई 2026 तक 1,02,000 से ज़्यादा रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन का आंकड़ा पार कर लिया है। यह भारत की मासिक सोलर कैपेसिटी में 20% से भी ज़्यादा का इजाफा दर्शाता है। राज्य की रणनीति पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना (PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana) से मिलने वाली केंद्र सरकार की मदद और राज्य की ₹30,000 तक की सब्सिडी का मिलाजुला असर है। इससे 3 kW सिस्टम की पेबैक अवधि घटकर सिर्फ 3 से 4 साल रह गई है।
सरकारी पहल और वेंडर नेटवर्क का विस्तार
यह ग्रोथ सिर्फ एक सरकारी स्कीम नहीं, बल्कि एक बड़े कंज्यूमर कैंपेन के तौर पर देखी गई। डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल अपनाते हुए, स्थानीय प्रशासकों ने स्मार्ट मीटर इंस्टॉलेशन के मौके का फायदा उठाकर सीधे घरों में सोलर पैनल लगाने को बढ़ावा दिया। लखनऊ नगर निगम (Lucknow Municipal Corporation) ने तो 10% प्रॉपर्टी टैक्स छूट का ऐलान कर लोगों को और प्रोत्साहित किया। इस बड़े पैमाने को संभालने के लिए, राज्य ने अपने वेंडर इकोसिस्टम का खूब विस्तार किया। अधिकृत सोलर वेंडरों की संख्या 600 से बढ़कर 6,000 हो गई। इन वेंडरों को आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) जैसे संस्थानों में ट्रेनिंग और सरकारी सहायता मिली।
कमर्शियल अडॉप्शन और क्षेत्रीय असमानता की चुनौती
घरेलू सेक्टर में शानदार सफलता के बावजूद, कुछ अड़चनें बनी हुई हैं। कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टर में अभी भी दिक्कतें हैं, खासकर नेट फीड-इन सिस्टम के कारण। यह सिस्टम, जो व्यवसायों के लिए है, आमतौर पर रेजिडेंशियल कंज्यूमर को मिलने वाले नेट मीटरिंग सिस्टम जितना फायदेमंद नहीं है। इस वजह से दुकानें और फैक्ट्रियां बड़े पैमाने पर सोलर सेटअप में निवेश करने से हिचकिचा रही हैं। इसके अलावा, प्रोजेक्ट के वितरण में भी एक बड़ी असमानता दिख रही है। जहां लखनऊ जैसे शहरी इलाकों में तेजी से सोलर अपनाया गया है, वहीं श्रावस्ती (Shravasti) जैसे ग्रामीण जिलों में शहरी घनत्व कम होने और स्थानीय वेंडरों की सीमित संख्या के कारण यह रफ्तार धीमी है।
ऊर्जा सेक्टर पर नजर रखने वाले निवेशकों और हितधारकों को यह देखना होगा कि क्या राज्य सरकार इस ग्रामीण-शहरी खाई को पाटने और कमर्शियल सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तीय लाभ बढ़ाने के लिए अपनी नीतियों में कोई बदलाव लाती है। इस मॉडल की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य वर्तमान इंफ्रास्ट्रक्चर को विभिन्न क्षेत्रीय और कमर्शियल प्रतिभागियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कितना अनुकूलित कर पाता है।
