अमेरिका के टैरिफ का बड़ा झटका: सोलर कंपनियों में घबराहट
यह फैसला अमेरिकी धरती पर सोलर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और भारतीय कंपनियों द्वारा अनुचित सरकारी सब्सिडी (Subsidy) के इस्तेमाल के आरोपों के जवाब में उठाया गया है। इस घोषणा से भारतीय सोलर कंपनियों में खलबली मच गई, जिसका असर 25 फरवरी, 2026 को शेयर बाजार में साफ दिखा।
Waaree Energies के शेयरों में 15% तक की भारी गिरावट आई और यह ₹2,571.45 के स्तर तक नीचे चला गया। वहीं, Premier Energies के शेयरों में करीब 6% की गिरावट दर्ज हुई और यह ₹666.90 पर आ गया। Vikram Solar के शेयर भी 7.8% तक लुढ़क गए। इन कंपनियों के ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volume) में भी काफी बढ़ोतरी देखी गई, जो निवेशकों की चिंता को दर्शाता है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग का अंतिम फैसला 6 जुलाई, 2026 को आने की उम्मीद है।
कंपनियों की अलग-अलग रणनीति और असर
हालांकि, इस टैरिफ का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा नहीं है।
Waaree Energies: कंपनी की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) की आय का लगभग 32.6% विदेशी बाजारों, खासकर अमेरिका से आता है। ऐसे में, इन शुल्कों का सीधा असर Waaree पर पड़ सकता है। हालांकि, कंपनी अपनी अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाकर (FY27 तक 4.2 GW का लक्ष्य) और गैर-चीनी सप्लाई चेन (Supply Chain) में निवेश करके (जैसे ओमान में पॉलीसिलिकॉन) इस जोखिम को कम करने की कोशिश कर रही है। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि ड्यूटी सोलर सेल की मूल जगह पर निर्भर करती है, न कि पैनल असेंबली पर, और भारत के कई पैनल इम्पोर्टेड सेल का इस्तेमाल करते हैं।
Premier Energies: इसके विपरीत, Premier Energies काफी हद तक सुरक्षित दिख रही है। कंपनी की Q3 FY26 की आय का 1% से भी कम हिस्सा एक्सपोर्ट (Export) से आता है, और इसका ज्यादातर बिजनेस डोमेस्टिक (घरेलू) है। कंपनी का मानना है कि इस व्यापारिक कदम का उसके ऑपरेशंस (Operations) या वित्तीय स्थिति पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
Vikram Solar: कंपनी का लगभग 20% ऑर्डर बुक एक्सपोर्ट से जुड़ा है, जो संभावित देरी या मूल्य निर्धारण (Pricing) दबाव का सामना कर सकता है।
सेक्टर का बड़ा परिदृश्य और भविष्य
भारत से अमेरिका को होने वाला सोलर PV एक्सपोर्ट हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है, जो FY2023-2024 में भारत के कुल PV एक्सपोर्ट का 97-99% रहा। भारत की सोलर प्रोडक्शन कैपेसिटी (Production Capacity) जनवरी 2026 तक 160 GW को पार कर चुकी है, जबकि घरेलू मांग केवल 40-45 GW रहने का अनुमान है। ऐसे में, यदि अमेरिका जैसे प्रमुख एक्सपोर्ट मार्केट में बाधा आती है, तो ओवरसप्लाई (Oversupply) का जोखिम बढ़ जाता है। यह स्थिति अमेरिका की 'इंफ्लेशन रिडक्शन एक्ट' (IRA) जैसी पहलों से और भी जटिल हो जाती है, जो घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करती है।
वैल्यूएशन पर चिंता और सप्लाई चेन की चुनौती
बाजार विश्लेषकों (Market Analysts) के लिए सेक्टर का वैल्यूएशन (Valuation) भी एक चिंता का विषय है। Waaree Energies का P/E रेशियो लगभग 24.6-29.2 और Premier Energies का 26.48 है। वहीं, Solar Industries India जैसी कंपनियां 80-90x के ऊंचे P/E रेशियो पर ट्रेड कर रही हैं, जो बाजार की ऊंची उम्मीदों को दर्शाता है। यदि अमेरिका के टैरिफ इन कंपनियों के मुनाफे (Profit) को प्रभावित करते हैं, तो उनके ऊंचे P/E रेशियो के कारण शेयरों में और बड़ी गिरावट का जोखिम है।
कंपनियों द्वारा अमेरिका में मैन्युफैक्चरिंग स्थापित करना एक पूंजी-गहन (Capital-intensive) प्रक्रिया है और इसमें एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) भी है। विविध वैश्विक सप्लाई चेन विकसित करना अभी भी एक प्रगतिशील कार्य है और इसे लंबे व्यापारिक विवादों या बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता से बाधा आ सकती है।
आगे क्या?
इन तात्कालिक चुनौतियों के बावजूद, Waaree Energies और Premier Energies को अपनी रणनीतियों पर भरोसा है। Waaree अपनी विविध सोर्सिंग और बढ़ते अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग बेस को अपनी ताकत मानती है, जबकि Premier Energies अपने मजबूत घरेलू फोकस के कारण स्थिति को कंपनी-विशिष्ट खतरे के बजाय व्यापक बाजार की भावना मानती है। घरेलू मांग और रणनीतिक एक्सपोर्ट मार्केट के बीच संतुलन बनाए रखना इस सेक्टर के सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा।