US सरकार का कड़ा रुख और Adani का डिफ़ॉल्ट
U.S. Department of Commerce ने भारत से इंपोर्ट (import) होने वाले सोलर प्रोडक्ट्स पर 125.87% की काउंटरवेलिंग ड्यूटी (countervailing duty) का शुरुआती रेट लगाया है। यह बड़ा कदम Adani Group की दो एंटिटीज, Mundra Solar Energy और Mundra Solar PV, द्वारा जांच प्रक्रिया से हटने और जरूरी जानकारी न देने के कारण उठाया गया है। उनकी इस गैर-सहयोग की वजह से डिपार्टमेंट ने 'Adverse Facts Available' तरीका अपनाया, जो सबसे सख्त पेनल्टी मानी जाती है। Alliance for American Solar Manufacturing and Trade द्वारा शुरू की गई इस जांच में भारतीय एक्सपोर्ट-लिंक्ड सब्सिडी प्रोग्राम्स जैसे Advance Authorisation Program और Duty Drawback Scheme की भी जांच हुई, जिन पर ये आरोप लगे कि वे अनुचित फायदे दे रहे थे। यह मामला ट्रेड टेंशन (trade tensions) को बढ़ाता है, खासकर तब जब 2024 में भारत से अमेरिका को सोलर एक्सपोर्ट (exports) नौ-गुना बढ़कर $792.6 मिलियन तक पहुंच गया था। 2021 से 2024 के बीच भारत के कुल मॉड्यूल एक्सपोर्ट का 90% से ज्यादा हिस्सा अमेरिका को ही जा रहा था।
एक्सपोर्ट्स पर खतरा और डोमेस्टिक मार्केट में सरप्लस
इतने भारी शुरुआती टैरिफ के कारण भारतीय सोलर एक्सपोर्टर्स के लिए अमेरिका का मार्केट लगभग बंद हो गया है। ICRA Limited के Ankit Jain जैसे एनालिस्ट्स का मानना है कि इससे एक्सपोर्ट वॉल्यूम पर बड़ा असर पड़ेगा। सरप्लस सोलर मॉड्यूल्स को भारतीय डोमेस्टिक मार्केट में भेजा जा सकता है, जिससे पहले से ही मौजूद मैन्युफैक्चरिंग ओवरकैपेसिटी (manufacturing overcapacity) के चलते कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा। भारत की मौजूदा सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी 160 GW से ज्यादा है, जबकि डोमेस्टिक डिमांड सालाना 40-45 GW के आसपास है। अगर एक्सपोर्ट बंद हुए तो यह ओवरसप्लाई (oversupply) का बड़ा रिस्क पैदा करेगा। इससे पहले अमेरिका द्वारा साउथ-ईस्ट एशिया से इंपोर्ट पर लगाए गए टैरिफ के कारण सप्लाई चेन में बदलाव आया था और फिर भारतीय एक्सपोर्ट्स में बढ़ोतरी हुई थी।
अमेरिका की डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग में तेजी
दूसरी तरफ, अमेरिका अपनी डोमेस्टिक सोलर मैन्युफैक्चरिंग (manufacturing) को तेजी से बढ़ा रहा है। अक्टूबर 2025 तक, अमेरिका के पास 60 GW से ज्यादा की सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी थी, जो दिसंबर 2024 के मुकाबले 37% ज्यादा है। अब अमेरिका सोलर सप्लाई चेन (supply chain) के हर हिस्से - इंगोट्स, वेफर्स, सेल्स और मॉड्यूल्स - को बनाने की क्षमता रखता है। सरकारी इंसेंटिव्स और एनर्जी इंडिपेंडेंस (energy independence) की तलाश में यह बढ़त देखी जा रही है। अमेरिका की सोलर सेल प्रोडक्शन कैपेसिटी में भी late 2024 से तीन गुना की बढ़त हुई है।
अन्य कंपनियों की स्थिति और मार्केट सेंटीमेंट
Adani Group की गैर-सहयोग की वजह से पेनल्टी सबसे ज्यादा है, लेकिन अन्य भारतीय सोलर मैन्युफैक्चरर्स भी इस ट्रेड डिस्प्यूट से प्रभावित हो रहे हैं। Waaree Energies, जिसका लगभग 32.6% रेवेन्यू (revenue) ओवरसीज मार्केट्स से आता है, सबसे ज्यादा सीधे अर्निंग्स रिस्क (earnings risk) झेल रहा है। इसके शेयर में तेज गिरावट आई है। हालांकि, Waaree के पास अमेरिका में 1.6 GW की मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी भी है, जो लोकल डिमांड पूरी कर सकती है। Vikram Solar और Premier Energies जैसे दूसरे खिलाड़ी, जो अमेरिका को कम एक्सपोर्ट करते हैं, कुछ हद तक सुरक्षित दिख रहे हैं। Vikram Solar ने अपनी सप्लाई चेन्स (supply chains) को डाइवर्सिफाई किया है और Premier Energies का एक्सपोर्ट रेवेन्यू (export revenue) नगण्य है। फिर भी, इस खबर के बाद इन कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखी गई, जो सेक्टर-वाइड (sector-wide) सेंटीमेंट शिफ्ट को दिखाता है।
स्ट्रक्चरल कमजोरियां और रेगुलेटरी रिस्क
US की कार्रवाई का मुख्य कारण यह आरोप है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को सरकारी सब्सिडीज (subsidies) मिल रही हैं, जिससे US प्रोड्यूसर्स को नुकसान हो रहा है। Adani पर लगी पेनल्टी US Department of Commerce के नॉन-कम्प्लायंस (non-compliance) पर कड़े रुख को दिखाती है। सिर्फ मौजूदा टैरिफ ही नहीं, बल्कि आगे भी जोखिम बने रहेंगे। भारतीय सोलर कंपनियों का चीनी इनपुट्स जैसे पॉलीसिलिकॉन (polysilicon) और सोलर ग्लास (solar glass) पर निर्भर रहना जांच के दायरे में आ सकता है, भले ही डोमेस्टिक इंसेंटिव प्रोग्राम्स बदल दिए जाएं। US के पिछले ट्रेड एक्शन का इतिहास यह बताता है कि डोमेस्टिक इंडस्ट्रीज को बचाने के लिए टारगेटेड ड्यूटीज (targeted duties) लगाई जाती हैं। निवेशकों को आगे भी ट्रेड डिस्प्यूट्स (trade disputes) या ड्यूटी रेट्स (duty rates) में बदलाव की संभावना पर गौर करना होगा, जो सेक्टर के लिए पॉलिसी रिस्क (policy risk) बनाएगा।
भविष्य की राह
आगे चलकर भारतीय सोलर सेक्टर एक अहम मोड़ पर खड़ा है। तत्काल चुनौती यह है कि एक्सपोर्ट वॉल्यूम्स (export volumes) को ऐसे डोमेस्टिक मार्केट में कैसे एडजस्ट किया जाए जहां पहले से ही ओवरकैपेसिटी (overcapacity) है। एनालिस्ट्स मॉड्यूल मैन्युफैक्चरर्स के लिए प्राइस कम्पटीशन (price competition) और प्रॉफिटेबिलिटी (profitability) पर असर की आशंका जता रहे हैं। कंपनियों को अमेरिका के मार्केट एक्सेस (market access) की कमी को पूरा करने के लिए यूरोप और अफ्रीका जैसे वैकल्पिक एक्सपोर्ट मार्केट्स (export markets) को ढूंढना होगा। अमेरिका का डोमेस्टिक प्रोडक्शन (domestic production) को बढ़ावा देने का कमिटमेंट जारी रहने की उम्मीद है, जिससे ग्लोबल ट्रेड डायनामिक्स (trade dynamics) में और बदलाव आएगा। भारतीय सोलर एक्सपोर्ट्स का लॉन्ग-टर्म भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कितनी रणनीतिक डाइवर्सिफिकेशन (diversification) करती हैं, मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट्स (manufacturing costs) को कैसे मैनेज करती हैं, और क्या बाइलेटरल ट्रेड नेगोशिएशन्स (bilateral trade negotiations) से इन बढ़ती ड्यूटीज को कम करने का कोई रास्ता निकलता है।