Solar Module Makers: घरेलू सोलर सेल अनिवार्यता पर राहत की मांग, क्या टल सकती है डेडलाइन?

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AuthorAditya Rao|Published at:
Solar Module Makers: घरेलू सोलर सेल अनिवार्यता पर राहत की मांग, क्या टल सकती है डेडलाइन?

भारत के सोलर मॉड्यूल निर्माताओं ने सरकार से सोलर सेल की अनिवार्य घरेलू खरीद (Domestic Sourcing) की डेडलाइन को दिसंबर 2027 तक बढ़ाने की अपील की है। फिलहाल, मॉड्यूल बनाने की क्षमता सेल की उपलब्धता से काफी ज्यादा है, जिससे कई छोटी कंपनियों का काम रुकने का खतरा पैदा हो गया है।

भारत में सोलर मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियां इन दिनों एक बड़े ऑपरेशनल संकट से जूझ रही हैं। 'रिन्यूएबल एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया' ने नीति आयोग (Niti Aayog) से मांग की है कि सोलर सेल की अनिवार्य घरेलू खरीद के नियम (ALMM) की समयसीमा को दिसंबर 2027 तक आगे बढ़ाया जाए। यह मांग इंडस्ट्री के उस असंतुलन के कारण उठी है, जहां मॉड्यूल प्रोडक्शन तेजी से बढ़ा है, लेकिन उसके मुकाबले सोलर सेल का उत्पादन अभी भी काफी पीछे है।

सप्लाई और डिमांड का भारी अंतर

इंडस्ट्री के ताजा आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं। भारत में मॉड्यूल प्रोडक्शन क्षमता बढ़कर करीब 193 GW हो गई है, जबकि इसके मुकाबले सोलर सेल बनाने की घरेलू क्षमता मात्र 30 GW है। इस भारी अंतर के कारण कंपनियों को काम पूरा करने के लिए जरूरी सेल नहीं मिल पा रहे हैं। खास तौर पर TOPCon जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी वाले सेल्स की बाजार में भारी कमी है।

छोटी कंपनियों के सामने बड़ा खतरा

यह संकट उन नॉन-इंटीग्रेटेड (Non-integrated) कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण है, जो खुद सेल नहीं बनातीं। बड़ी कंपनियां, जो वर्टिकली इंटीग्रेटेड हैं (जो सेल और मॉड्यूल दोनों बनाती हैं), उन्हें तो कच्चा माल मिल जाता है, लेकिन छोटी कंपनियों को बाजार से ऊंचे दाम पर सेल खरीदने पड़ते हैं। माल न मिलने की वजह से कई मिड-साइज कंपनियों के ऑपरेशंस या तो ठप हो रहे हैं या उनकी रफ्तार धीमी हो गई है।

रेगुलेटरी दबाव और निवेशकों के लिए संकेत

ALMM लिस्ट-II पॉलिसी के तहत सरकारी योजनाओं से जुड़े सोलर प्रोजेक्ट्स में घरेलू सेल का इस्तेमाल अनिवार्य है। हालांकि सरकार ने नेट-मीटरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए 31 दिसंबर 2026 तक कुछ राहत दी है, लेकिन पूरे सेक्टर के लिए डेडलाइन बढ़ाना एक बड़ी चुनौती है।

निवेशकों के लिए यहाँ दो तरह की कंपनियां हैं:

  1. इंटीग्रेटेड प्लेयर्स: ये इस संकट से बेहतर तरीके से निपट रहे हैं क्योंकि इनके पास अपनी सप्लाई चेन है।
  2. नॉन-इंटीग्रेटेड प्लेयर्स: इनके लिए प्रोजेक्ट में देरी और लागत बढ़ने का रिस्क ज्यादा है।

आगे चलकर यह देखना अहम होगा कि सरकार इस याचिका पर क्या फैसला लेती है। अगर सप्लाई गैप नहीं भरा गया, तो भारत के रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं। निवेशकों को अब सरकारी पॉलिसी अपडेट्स और बाजार में सेल की उपलब्धता पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.