REI Expo 2026 में स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और भारत ने क्लीन एनर्जी के लिए हाथ मिलाया है। इस पार्टनरशिप का मुख्य फोकस बैटरी स्टोरेज और रिन्यूएबल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना है, ताकि भारत अपने नेट-जीरो लक्ष्यों को हासिल कर सके।
ग्रेटर नोएडा में आयोजित 'रिन्यूएबल एनर्जी इंडिया (REI) एक्सपो 2026' के मंच से एक नई रणनीतिक साझेदारी का ऐलान हुआ है। इस साझेदारी के जरिए स्कॉटलैंड की तकनीकी विशेषज्ञता और भारत की विशाल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को एक साथ लाया जाएगा। इस इवेंट में 10 से ज्यादा देशों की 1,080 से अधिक कंपनियों ने हिस्सा लिया है, जो भारत के क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की दिशा में एक बड़ा कदम है।
बैटरी स्टोरेज का खेल
भारत में सोलर और विंड एनर्जी की क्षमता तो बढ़ रही है, लेकिन ग्रिड की स्थिरता के लिए 'बैटरी स्टोरेज' अभी भी चुनौती बना हुआ है। स्कॉटलैंड की ऑफशोर विंड और कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी से भारत में बैटरी स्टोरेज की लागत कम होने की उम्मीद है। एनर्जी सेक्टर के लिए यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि बेहतर स्टोरेज ही रिन्यूएबल एनर्जी की अनियमित सप्लाई को बैलेंस कर सकता है और प्रोजेक्ट्स की प्रॉफिटेबिलिटी को बढ़ा सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 गीगावाट नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता हासिल करना है। इस दिशा में सरकार 'प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव' (PLI) स्कीम के जरिए स्थानीय स्तर पर एडवांस केमिस्ट्री सेल बैटरी बनाने पर जोर दे रही है। कई भारतीय दिग्गजों ने 'गीगाफैक्ट्री' में भारी निवेश किया है। अंतरराष्ट्रीय पार्टनरशिप से टेक्नोलॉजी जल्दी अडॉप्ट होगी, जो कंपनियों के मार्जिन के लिए सकारात्मक साबित हो सकती है।
हालांकि, निवेशकों को सेक्टर से जुड़ी चुनौतियों पर भी नजर रखनी चाहिए। हाई कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex), लिथियम और कोबाल्ट जैसे कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता और ग्लोबल कंपनियों से तगड़ा कॉम्पिटिशन इस सेक्टर के बड़े जोखिम हैं। साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देरी या बजट बढ़ना (Cost Overruns) भी मुनाफे पर असर डाल सकता है। अब निवेशकों को इस पार्टनरशिप से निकलने वाले जॉइंट वेंचर्स और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर एग्रीमेंट्स पर नजर रखनी होगी, जो भविष्य में कंपनियों की एग्जीक्यूशन स्पीड तय करेंगे।
