सांता मार्टा में हुई एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) को लेकर हुई कॉन्फ्रेंस ने दुनिया भर में जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuel) से दूरी बनाने की कोशिशों में मौजूद गहरी आर्थिक और भू-राजनीतिक (Geopolitical) दरारों को उजागर किया है।
पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और उसके कारण ऊर्जा की कीमतों में हुए उतार-चढ़ाव के बीच, जीवाश्म ईंधन से बाहर निकलने का रास्ता खोजने की कोशिशें और भी महत्वपूर्ण हो गई थीं। हालांकि, सांता मार्टा कॉन्फ्रेंस एक एकीकृत वैश्विक रणनीति बनाने के बजाय, विभिन्न देशों के अपने-अपने हितों और प्राथमिकताओं को दर्शाती है।
पश्चिम एशिया के संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को 3.2% तक धीमा कर दिया है, जबकि 2026 तक ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें $80 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं, जिनमें $100 के पार जाने का जोखिम है। यह ऊर्जा सुरक्षा के लिए लगातार खतरा पैदा कर रहा है। ऐसे में, नॉर्वे और ब्राजील जैसे देश, जो जीवाश्म ईंधन से राजस्व पर निर्भर हैं, कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए। नॉर्वे 2026 में तेल और गैस में $23 बिलियन के निवेश की योजना बना रहा है, जबकि ब्राजील 2030 तक अपने तेल उत्पादन के चरम पर पहुंचने की उम्मीद कर रहा है। उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि वे ट्रांजिशन (Transition) चर्चाओं को प्रभावित करना चाहते हैं, भले ही वे अपने हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) संबंधों को बनाए रखना चाहते हों।
इस समूह से भारत और चीन जैसे प्रमुख विकासशील देशों की अनुपस्थिति एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। ये देश नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) में बड़ी भूमिका निभाते हैं। भारत 2025 में लगभग 50 GW नवीकरणीय ऊर्जा जोड़ी और 2030 तक 500 GW का लक्ष्य रखता है। चीन की 60% से अधिक बिजली क्षमता गैर-जीवाश्म स्रोतों से आती है। इन देशों को औद्योगिकीकरण और जीवन स्तर सुधारने के लिए भारी ऊर्जा की आवश्यकता है, और उनकी प्राथमिकताएं फाइनेंसिंग (Financing), ऊर्जा पहुंच और सुरक्षा हैं, जो इस मंच द्वारा पूरी तरह से संबोधित नहीं हुईं।
कॉन्फ्रेंस का लक्ष्य प्रतिबद्धताओं को व्यावहारिक कदमों में बदलना था, लेकिन प्रमुख देशों की अनुपस्थिति और विशाल वित्तीय अंतराल (Financial Gaps) ने इसे चुनौती दी है। 2025 में एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) में वैश्विक निवेश $2.3 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, लेकिन विकासशील देशों को भारी कर्ज, घटती सहायता और बढ़ती उधार लागत का सामना करना पड़ रहा है। इससे अमीर देशों के लिए तो ट्रांजिशन टेक्नोलॉजीज (Transition Technologies) में निवेश करना संभव है, लेकिन कई विकासशील अर्थव्यवस्थाएं आवश्यक नवीकरणीय परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
भू-राजनीतिक अस्थिरता और एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) के प्रति खंडित दृष्टिकोण से बड़े जोखिम जुड़े हैं। सुरक्षा चिंताएं कभी-कभी जीवाश्म ईंधन में अधिक निवेश की ओर ले जा सकती हैं, जिससे डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) की गति धीमी हो सकती है। मुख्य 'करने वालों' के समूह से प्रमुख ऊर्जा उपभोक्ताओं और नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स को बाहर करने से किसी भी ट्रांजिशन योजना की विश्वसनीयता कमजोर होती है। बिना किसी वैश्विक रणनीति के, जो विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतों और कमजोरियों को संबोधित करे, यह ट्रांजिशन धीमा, असमान और भू-राजनीतिक प्रभाव के अधीन रहने का खतरा है।
सांता मार्टा में दिखी दरारें यह दर्शाती हैं कि वैश्विक एनर्जी ट्रांजिशन (Energy Transition) विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय रणनीतियों के माध्यम से ही आगे बढ़ेगा, जो आर्थिक, राजनीतिक और संसाधन संबंधी अंतरों से आकार लेंगे। पश्चिम एशिया संकट और विश्वसनीय ऊर्जा की निरंतर आवश्यकता निकट और मध्यम अवधि में हाइड्रोकार्बन की भूमिका को बनाए रख सकती है, भले ही कुछ बाजारों में नवीकरणीय ऊर्जा का विकास हो। ट्रांजिशन की सफलता वैश्विक समुदाय की फाइनेंसिंग गैप (Financing Gap) को पाटने और सभी देशों, विशेषकर सबसे कमजोर लोगों के लिए एक सुरक्षित, समान ऊर्जा भविष्य सुनिश्चित करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।