रिकॉर्ड पाइपलाइन के पीछे छुपी हकीकत
दुनिया भर में क्लीन एनर्जी (Clean Energy) के क्षेत्र में एक बड़ी तस्वीर उभर रही है। 2025 में, विंड (Wind) और यूटिलिटी-स्केल सोलर (Utility-scale Solar) प्रोजेक्ट्स का ग्लोबल पाइपलाइन (Global Pipeline) 4.9 टेरावॉट (TW) के अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। यह पिछले साल 4.4 टेरावॉट (TW) की तुलना में 11% की सालाना बढ़त (YoY) दिखाता है। लेकिन, इस आंकड़े के पीछे एक बड़ी चिंता छुपी है: यह डेवलपमेंट ज़्यादातर इमर्जिंग मार्केट्स (Emerging Markets), खासकर चीन और भारत जैसे देशों में हो रहा है, जबकि विकसित G7 राष्ट्र अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में काफी पीछे छूट रहे हैं।
इमर्जिंग मार्केट्स की चमक
क्लीन एनर्जी की इस तेज़ी का सबसे बड़ा श्रेय चीन को जाता है। अकेले चीन के पास 1.5 टेरावॉट (TW) से ज़्यादा की प्रस्तावित क्षमता (Prospective Capacity) है, जो किसी भी अन्य देश के मुकाबले बहुत ज़्यादा है। चीन में अभी 448 गीगावॉट्स (GW) के प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन (Construction) के तहत हैं, जो दुनिया भर के कुल प्रोजेक्ट्स का आधे से ज़्यादा है। भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है, जहाँ 125 गीगावॉट्स (GW) के प्रोजेक्ट्स निर्माणाधीन हैं और 163 गीगावॉट्स (GW) की क्षमता पहले से ही चालू है। अनुमान है कि BRICS+ देश 2050 तक अपनी 80% से ज़्यादा बिजली रिन्यूएबल्स (Renewables) से बना सकते हैं, जो G7 देशों से दोगुना होगा। हालांकि, यह भी सच है कि इमर्जिंग मार्केट्स को ग्लोबल क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट का 15% से भी कम हिस्सा मिलता है।
G7 देशों में सुस्त रफ़्तार
इसके विपरीत, G7 देशों की हालत चिंताजनक है। दुनिया की आधी दौलत पर कब्ज़ा रखने के बावजूद, ये देश दुनिया की प्रस्तावित क्लीन एनर्जी क्षमता का महज़ 11% ही दर्शाते हैं। 2023 से उनका संयुक्त पाइपलाइन लगभग 520 गीगावॉट्स (GW) पर ही अटका हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन देशों में प्रोजेक्ट्स को लागू करने में कई बड़ी बाधाएं हैं, जैसे परमिट (Permitting) मिलने में देरी, ग्रिड (Grid) की क्षमता की कमी, स्थानीय विरोध और ट्रांसमिशन (Transmission) इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) का धीमा विस्तार। ये मुद्दे विकसित देशों में तेज़ी से प्रोजेक्ट्स शुरू करने में रुकावट पैदा कर रहे हैं।
फाइनेंसिंग की राह में रोड़ा
बढ़ती ब्याज दरें (Interest Rates) भी ग्लोबल एनर्जी ट्रांज़िशन (Global Energy Transition) के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रही हैं। कैपिटल-इंटेंसिव (Capital-intensive) रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर इसका सीधा असर पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है और वे जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) के मुकाबले कम प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं। यह समस्या इमर्जिंग मार्केट्स में और भी गंभीर है, जहाँ कैपिटल की लागत (Cost of Capital) पहले से ही ज़्यादा है।
भविष्य का डर: सिर्फ पाइपलाइन काफी नहीं
रिकॉर्ड 4.9 टेरावॉट्स (TW) का पाइपलाइन भले ही बड़ा दिख रहा हो, लेकिन यह भविष्य की क्षमता की गारंटी नहीं है। विश्लेषण बताते हैं कि लगभग 40% नियोजित प्रोजेक्ट्स में देरी, रद्द होने या रुकने का खतरा है। खास तौर पर विंड प्रोजेक्ट्स को राजनीतिक बाधाओं, पॉलिसी अनिश्चितता (Policy Uncertainty) और असफल ऑक्शन (Auctions) के कारण ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इन इम्प्लीमेंटेशन रिस्क (Implementation Risks) के अलावा, ग्रिड की मौजूदा बाधाएं और धीमी परमिट प्रक्रियाएं दुनिया को 2030 तक COP28 में तय किए गए रिन्यूएबल क्षमता को तीन गुना करने के लक्ष्य से करीब 1 टेरावॉट (TW) विंड और 1.6 टेरावॉट (TW) सोलर की कमी पर छोड़ सकती हैं।
आगे की राह
आगे चलकर, इस सेक्टर में एक तरह का रीकैलिब्रेशन (Recalibration) देखने को मिल सकता है। 2025 में निवेश भले ही ज़्यादा रहा हो, लेकिन ग्रोथ की रफ़्तार धीमी होने की उम्मीद है। एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि ब्याज दरों और पॉलिसी अनिश्चितता का दबाव प्रोजेक्ट इकोनॉमिक्स (Project Economics) पर बना रहेगा, खासकर G7 देशों में जहाँ मुख्य चुनौती प्रोजेक्ट्स को हकीकत में बदलना है। रिन्यूएबल्स के सफल विस्तार के लिए परमिट प्रक्रिया को तेज़ करने, ग्रिड और स्टोरेज (Storage) में निवेश बढ़ाने और स्पष्ट लॉन्ग-टर्म पॉलिसी (Long-term Policy) संकेत देने की ज़रूरत होगी।