पूर्वोत्तर भारत रिन्यूएबल एनर्जी का बड़ा हब बनने की तैयारी में है, जिसके लिए **₹2.6 लाख करोड़** से ज़्यादा का भारी-भरकम निवेश किया जा रहा है। मगर, इन महत्वाकांक्षी योजनाओं की सफलता पूरी तरह से क्षेत्र के पावर ग्रिड के ताज़ा Upgrade पर टिकी हुई है।
ग्रिड की समस्या से प्रोजेक्ट्स पर खतरा
पूर्वोत्तर भारत को देश के रिन्यूएबल एनर्जी ट्रांज़िशन (Renewable Energy Transition) का अहम केंद्र बनाने की कोशिशें ज़ोरों पर हैं। असम ने अकेले ₹77,353 करोड़ के बड़े निवेश का ऐलान किया है, जबकि अरुणाचल प्रदेश ने 'डेकेड ऑफ हाइड्रोपावर' (Decade of Hydropower) पहल शुरू की है, जिसका लक्ष्य 19 GW नई क्षमता जोड़ना है और इसमें अंदाज़न ₹1.9 लाख करोड़ लगेंगे। ये आंकड़े सरकार की मंशा तो दिखाते हैं, लेकिन असली चुनौती इस बिजली को लोगों तक पहुंचाने वाले इंफ्रास्ट्रक्चर की है।
सालों से चली आ रही ग्रिड की दिक्कतें
ऐतिहासिक रूप से, पूर्वोत्तर के राज्यों में ट्रांसमिशन नेटवर्क (Transmission Network) का विकास बहुत धीमा रहा है। यहां की विशाल हाइड्रोपावर (Hydropower) क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। वजह है प्रोजेक्ट्स में देरी, मुश्किल इलाके, ज़मीन अधिग्रहण की समस्याएं और पर्यावरण मंजूरी। सबसे बड़ी कमी सिर्फ बिजली बनाने की नहीं, बल्कि 'लास्ट-माइल कनेक्टिविटी' (Last-mile Connectivity) की है। जिस बिजली को उत्पादन स्थल से इंडस्ट्रियल हब (Industrial Hub) या नेशनल ग्रिड तक नहीं पहुंचाया जा सकता, वह बेकार हो जाती है। मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क के बिना, ज़्यादा उत्पादन का कोई मतलब नहीं रह जाता।
भूकंप-प्रवण इलाकों में इंजीनियरिंग की चुनौती
इस क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में खास इंजीनियरिंग चुनौतियां भी हैं। ज़्यादातर निर्माण भूकंप-प्रवण क्षेत्र V (Seismic Zone V) में हो रहा है, जिसके लिए सुरक्षा और स्थिरता के बहुत ऊंचे मानक ज़रूरी हैं। खासकर बड़े पंप-स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (Pumped-storage projects) के लिए, जो ग्रिड को बैलेंस करने का काम करते हैं। ये प्रोजेक्ट्स तब बिजली देते हैं जब सोलर पावर कम हो या मांग बढ़ जाए। लेकिन इनकी असरदार परफॉर्मेंस पूरी तरह से ग्रिड की स्थिरता पर निर्भर करती है। ट्रांसमिशन सिस्टम फेल होने का मतलब है स्टोरेज कैपेसिटी (Storage Capacity) का बेकार हो जाना।
उद्योगों के लिए बिजली की किल्लत
इंफ्रास्ट्रक्चर की इस कमी का सीधा असर औद्योगिक विकास पर पड़ रहा है। असम में चिप-असेंबली (Chip-assembly) और सिक्किम में फार्मा (Pharmaceutical) जैसे नए उद्योगों को भरोसेमंद और अच्छी क्वालिटी की बिजली चाहिए। ये इंडस्ट्रीज़ रुक-रुक कर आने वाली सप्लाई पर नहीं चल सकतीं। अगर ट्रांसमिशन बैकबोन (Transmission Backbone) तैयार नहीं है, तो इन प्रोजेक्ट्स में देरी होगी, भले ही पड़ोसी राज्यों में कितनी भी बिजली बन रही हो।
निवेशकों को क्या देखना है?
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात यह है कि पावर जेनरेशन प्रोजेक्ट्स (Power Generation Projects) के साथ-साथ ग्रिड का विकास कितनी तेजी से हो रहा है। जैसे-जैसे Central Electricity Regulatory Commission (CERC) ग्रिड कनेक्टिविटी के नियम बना रही है, यह देखना ज़रूरी है कि ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे हो रहे हैं या नहीं। जंगल की ज़मीन को क्लियर कराने या ट्रांसमिशन लाइनों के लिए राइट-ऑफ-वे (Right-of-way) हासिल करने में देरी जैसी समस्याएं पहले भी पावर प्रोजेक्ट्स के लिए बाधा बनती रही हैं। आखिर में, सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जेनरेशन टारगेट्स (Generation Targets) को बाज़ार तक बिजली पहुंचाने वाले ट्रांसमिशन कॉरिडोर (Transmission Corridors) बनाने के पक्के, समयबद्ध वादे के साथ कैसे जोड़ा जाता है।
