Ministry of New and Renewable Energy (MNRE) ने सोलर सेक्टर में चल रहे खेल को रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग के नाम पर सस्ते चीनी वेफर्स का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों की खैर नहीं होगी।
नियम तोड़ने पर होगी ब्लैकलिस्टिंग
मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी (MNRE) ने 'Domestic Content Requirement' (DCR) व्यवस्था में मौजूद खामियों को बंद करने के लिए प्रशासनिक शिकंजा कस दिया है। मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि सोलर सेल बनाने वाली कंपनियों को अब एक बाइंडिंग अंडरटेकिंग देनी होगी। इसमें साफ तौर पर चीनी वेफर्स के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। अगर कोई कंपनी दोषी पाई जाती है, तो उसे सरकार सीधे ब्लैकलिस्ट कर सकती है।
क्या है 'ब्लू' और 'ब्लैक' वेफर का खेल?
इस गड़बड़ी की जड़ में 'सिलिकॉन वेफर्स' का अंतर है। DCR स्टेटस पाने के लिए सोलर सेल्स को भारत में 'ब्लैक वेफर्स' (undiffused silicon wafers) से प्रोसेस करना अनिवार्य है। लेकिन, कुछ मार्केट प्लेयर्स लागत बचाने के लिए चीन से 'ब्लू वेफर्स' मंगाकर उन्हें भारत में प्रोसेस करते हैं और 'मेड इन इंडिया' का लेबल लगा देते हैं। इससे वे सरकारी सब्सिडी और PM सूर्य घर योजना जैसे टेंडर्स का गलत फायदा उठा रहे थे।
इंडस्ट्री के सामने बड़ी चुनौती
भारत की सोलर मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी में एक बड़ा असंतुलन है। जहां भारत की मॉड्यूल असेंबली कैपेसिटी 193 GW तक पहुंच चुकी है, वहीं सोलर सेल बनाने की क्षमता अभी सिर्फ 30 GW के आसपास है। इस गैप के कारण जेन्युइन सेल्स की सप्लाई कम है, जिससे डेवलपर्स और EPC कॉन्ट्रैक्टर्स पर दबाव बढ़ रहा है।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
यह कदम उन कंपनियों के लिए फायदेमंद है जो पूरी तरह से 'वर्टिकली इंटीग्रेटेड' हैं (जो सेल और मॉड्यूल दोनों खुद बनाती हैं)। वहीं, जो कंपनियां केवल असेंबली या इंपोर्टेड सेमी-फिनिश्ड कंपोनेंट्स पर टिकी थीं, उनके लिए प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। बाजार अब यह देख रहा है कि मंत्रालय सप्लाई चेन की कमी और सख्त नियमों के बीच तालमेल कैसे बिठाता है।
