केरल सरकार ने राज्य में बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए 'फ्लोटिंग सोलर' (Floating Solar) प्रोजेक्ट्स पर फोकस बढ़ा दिया है। जमीन की कमी से निपटने के लिए अब जलाशयों का इस्तेमाल सौर ऊर्जा पैदा करने के लिए किया जाएगा। निवेशकों के लिए इस योजना की सफलता सरकारी मंजूरी की रफ्तार और प्रोजेक्ट की लागत पर टिकी है।
जमीन की कमी का स्मार्ट समाधान
केरल की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति और घनी आबादी के कारण पारंपरिक सोलर प्लांट लगाना एक बड़ी चुनौती है। राज्य सरकार अब जलाशयों और झीलों का उपयोग सौर ऊर्जा के लिए करने की तैयारी में है। बिजली मंत्री सनी जोसेफ के नेतृत्व में शुरू की गई इस योजना से 2,000 MW तक बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
लागत और तकनीक का गणित
सामान्य सोलर फार्म के मुकाबले फ्लोटिंग सोलर की सेटअप कॉस्ट अधिक होती है। इसके लिए विशेष फ्लोटिंग प्लेटफॉर्म, एंकरिंग और पानी के क्षरण (corrosion) को झेलने वाले उपकरणों की जरूरत होती है। हालांकि, पानी के ठंडा होने के कारण सोलर पैनल की दक्षता (efficiency) बढ़ जाती है, जो लंबी अवधि में निवेश के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
सरकारी बाधाएं और चुनौतियां
प्रोजेक्ट्स के लिए 'सिंगल-विंडो क्लियरेंस' (Single-window clearance) की मांग जोर पकड़ रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकारी मंजूरी में देरी और जलाशयों में पानी की काई (algae) से पैनल की सफाई करना एक बड़ी ऑपरेशनल चुनौती होगी।
KSEB की ग्रिड मॉर्डनाइजेशन पर नजर
Kerala State Electricity Board (KSEB) के चेयरमैन एम.जी. राजामाणिकम ने बताया कि कंपनी का फोकस अब 'स्मार्ट ग्रिड' पर है। भविष्य में सोलर, विंड और वेस्ट-टू-एनर्जी जैसे स्रोतों को एक साथ एकीकृत (integrate) करके बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। निवेशकों की नजरें अब इन प्रोजेक्ट्स के निष्पादन (execution) और बजट अनुशासन पर टिकी होंगी।
