कर्नाटक सरकार ने रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में **30 GW** क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए **₹3 लाख करोड़** के निवेश की उम्मीद है। डेवलपर्स को आकर्षित करने के लिए सरकार ने बिजली नियामक से मार्केट-आधारित प्राइसिंग अपनाने की अपील की है, जिस पर निवेशकों की नजरें टिकी हैं।
कर्नाटक सरकार ने अगले 5 सालों में रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में 30 GW का इजाफा करने के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप तैयार किया है। इस योजना का मुख्य मकसद सोलर, विंड और एनर्जी स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर विकसित करना है, जिससे राज्य में लगभग ₹3 लाख करोड़ का निवेश आने की संभावना है। इस रणनीति के तहत, सरकार ने 'कर्नाटक इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन' (KERC) से फिक्स्ड टैरिफ कैप को खत्म कर मार्केट-निर्धारित बिडिंग प्रक्रिया अपनाने का औपचारिक आग्रह किया है।
प्राइसिंग का गणित और चुनौतियां
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार और नियामक (KERC) के बीच तालमेल कैसे बैठता है। जहां डेवलपर्स का मानना है कि सख्त टैरिफ कैप्स के कारण सप्लाई चेन की अस्थिरता को मैनेज करना मुश्किल होता है, वहीं KERC ने हाल ही में उपकरण सस्ते होने का हवाला देते हुए सोलर टैरिफ में कटौती की है। अगस्त 2026 में जारी आदेशों के बाद, कंपनियों के लिए प्रॉफिट मार्जिन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या नियामक सरकार की मार्केट-ड्रिवेन प्राइसिंग की मांग को मानता है या फिर आम उपभोक्ताओं के हितों को प्राथमिकता देते हुए दरों को कम रखता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और जोखिम
इस 30 GW के लक्ष्य को हासिल करने के लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) में भारी निवेश की जरूरत है। हालांकि राज्य सरकार इन मुद्दों को सुलझाने के लिए स्टैंडअलोन BESS टेंडर लेकर आई है, लेकिन नियामक मोर्चे पर कानूनी अड़चनें और सेंट्रल गवर्नमेंट के ओपन-एक्सेस नियमों से जुड़ी चुनौतियां प्रोजेक्ट्स में देरी पैदा कर सकती हैं। आने वाले समय में, KERC का रुख ही यह तय करेगा कि रिन्यूएबल सेक्टर में भाग लेने वाले डेवलपर्स को वास्तव में कितना रिटर्न मिलेगा।
