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भारत का सोलर पावर: मॉड्यूल का बंपर उत्पादन, पर 'सेल' की भारी किल्लत! इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ी

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत का सोलर पावर: मॉड्यूल का बंपर उत्पादन, पर 'सेल' की भारी किल्लत! इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ी
Overview

भारत का सोलर पावर सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है, जहाँ **2025** तक **210 गीगावाट (GW)** से ज़्यादा की मॉड्यूल बनाने की क्षमता (Capacity) तैयार हो जाएगी। लेकिन, एक बड़ी चिंता यह है कि इसी दौरान सोलर सेल (Solar Cell) बनाने की क्षमता महज़ **27 GW** ही होगी। इस भारी अंतर की वजह से देश को बड़े पैमाने पर इंपोर्ट पर निर्भर रहना पड़ेगा, खासकर सेल्स का, जिससे लागत बढ़ने और सप्लाई चेन कमजोर होने का खतरा मंडरा रहा है।

भारत का मैन्युफैक्चरिंग गैप: मॉड्यूल बूम, पर सेल में किल्लत

यह स्थिति भारत के रिन्यूएबल एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग के लक्ष्यों के बीच एक बड़ा और चिंताजनक अंतर दिखाती है। जहाँ मॉड्यूल असेंबली की क्षमता तेजी से आसमान छू रही है, वहीं सोलर सेल के उत्पादन की नींव अभी भी काफी कमजोर है। यह गैप देश को इंपोर्ट पर भारी निर्भर बना रहा है, जो लागत और सप्लाई चेन दोनों के लिए एक बड़ा सिरदर्द है।

भारत की गंभीर सेल शॉर्टेज

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने 2025 तक 119 GW की ज़बरदस्त सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता हासिल कर ली है, लेकिन सेल प्रोडक्शन मात्र 9 GW बढ़कर लगभग 27 GW तक ही पहुंचा है। इसका मतलब है कि घरेलू सेल क्षमता, मॉड्यूल क्षमता का केवल 15.3% है। नतीजतन, देश को 99 GW के मॉड्यूल और सेल इंपोर्ट करने पड़ रहे हैं, जिनमें से 75% हिस्सा अकेले सेल्स का है। यह इंपोर्ट पर निर्भरता सीधे तौर पर लागत को प्रभावित करती है, क्योंकि भारत को ग्लोबल लीडर्स, खासकर चीन, से कॉम्पिटिशन का सामना करना पड़ता है, जो पॉलीसिलिकॉन (93%), वेफर्स (97%), और सेल्स (85%) जैसे ज़रूरी कंपोनेंट्स पर हावी है। ALMM लिस्ट-II का नया नियम, जिसके तहत जून 2026 से सरकारी प्रोजेक्ट्स में डोमेस्टिक सेल्स का इस्तेमाल अनिवार्य होगा, इस सीमित घरेलू सप्लाई पर डिमांड को और बढ़ाएगा, जिससे बड़े प्रोजेक्ट्स की लागत में इज़ाफ़ा होने की आशंका है।

चुनौतियाँ और कंपनियों का फोकस

चीन की सोलर सप्लाई चेन पर अपनी पकड़ बनाने की भारत की कोशिशों के सामने कई बड़ी बाधाएं हैं। देश की मॉड्यूल क्षमता अब करीब 210 GW पर है, जो घरेलू मांग के अनुमान 40 GW से कहीं ज़्यादा है। लेकिन, इस मॉड्यूल ओवरकैपेसिटी के विपरीत, सेल की भारी कमी बनी हुई है। इस असंतुलन के कारण, नई मॉड्यूल क्षमता का एक बड़ा हिस्सा इंपोर्टेड सेल्स पर ही निर्भर रहेगा, जिससे अपस्ट्रीम इंटीग्रेशन (उत्पादन प्रक्रिया के शुरुआती चरणों का एकीकरण) सीमित हो जाएगा। Waaree Energies जैसी कंपनियाँ इस सेक्टर में तेज़ी से विस्तार कर रही हैं। Nuvama Institutional Equities ने कंपनी के मजबूत एग्जीक्यूशन और सितंबर 2026 तक सेल मैन्युफैक्चरिंग में विस्तार की योजनाओं को देखते हुए, Waaree के शेयर पर ₹3,867 का टारगेट प्राइस के साथ 'Buy' रेटिंग दी है। हालांकि, Waaree की सेल क्षमता, बढ़ रही होने के बावजूद, अभी भी ऐसे सेक्टर का हिस्सा है जहाँ डोमेस्टिक सेल आउटपुट, कुल मॉड्यूल क्षमता का एक छोटा सा अंश है। सेक्टर में TOPCon और मोनोक्रिस्टलाइन जैसी एडवांस टेक्नोलॉजीज़ को तेज़ी से अपनाया जा रहा है। फिलहाल, 70% मॉड्यूल क्षमता TOPCon तकनीक का इस्तेमाल कर रही है और 57% से ज़्यादा सेल क्षमता मोनोक्रिस्टलाइन तकनीक पर आधारित है। इसके बावजूद, जब इंपोर्टेड सेल्स का इस्तेमाल होता है, तो 'मेड इन इंडिया' मॉड्यूल्स की कुल लागत, पूरी तरह से इंपोर्टेड चीनी प्रोडक्ट्स के मुकाबले कहीं ज़्यादा प्रतिस्पर्धी नहीं हो पाती। पॉलीसिलिकॉन प्राइस, जो कि एक मुख्य अपस्ट्रीम कंपोनेंट है, में उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन मध्यम वृद्धि की उम्मीद है। ग्लोबल डिमांड मुख्य रूप से सोलर और सेमीकंडक्टर सेक्टर से प्रेरित है।

सप्लाई चेन के रिस्क और टैरिफ

सोलर सेल मैन्युफैक्चरिंग में बड़ा डेफिसिट (घाटा) इस सेक्टर की सबसे बड़ी कमजोरी है। 210 GW की मॉड्यूल क्षमता और महज़ 27 GW की सेल क्षमता के साथ, इंडस्ट्री अपनी बढ़ी हुई असेंबली लाइनों के लिए इंपोर्ट पर भारी निर्भरता का सामना कर रही है। सेल मैन्युफैक्चरिंग में कंसंट्रेशन (कुछ ही कंपनियों का दबदबा) की वजह से यह असंतुलन और बढ़ जाता है, जहाँ टॉप 10 प्लेयर्स 99.5% क्षमता को कंट्रोल करते हैं। इसके अलावा, भारत में वेफर या पॉलीसिलिकॉन का लगभग कोई उत्पादन नहीं है, जो इसे ग्लोबल सप्लाई चेन में व्यवधानों और मूल्य में अचानक होने वाले बदलावों के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है, जिनका बड़ा हिस्सा चीन के मार्केट डोमिनेंस से तय होता है। भारत के एक्सपोर्ट्स, जो ज़्यादातर अमेरिकी मार्केट पर निर्भर हैं ( 2025 में 96.8% मॉड्यूल), अब बढ़ते अमेरिकी टैरिफ (50% तक) के जोखिम में हैं, जिसके चलते शिपमेंट में भारी गिरावट आई है। इस एक्सपोर्ट में आई कमी के लिए एक रणनीतिक बदलाव की ज़रूरत है, लेकिन स्थापित चीनी फर्मों के खिलाफ 'ग्लोबल साउथ' जैसे बाजारों में मुकाबला करना एक कठिन चुनौती है।

भविष्य की ग्रोथ की उम्मीदें

भारत की सोलर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में अनुमानित वृद्धि, जिसमें 2030 तक मॉड्यूल क्षमता 160 GW और सेल क्षमता 120 GW तक पहुंचने का अनुमान है, मौजूदा घाटे को पाटने के एक महत्वपूर्ण प्रयास को दर्शाती है। हालांकि, इस पैमाने को हासिल करने के लिए भारी निवेश के साथ-साथ प्रमुख टेक्नोलॉजी और लागत से जुड़ी चुनौतियों को पार पाना ज़रूरी होगा। एनालिस्ट फर्म Nuvama, Waaree Energies जैसी कंपनियों के लिए मजबूत ग्रोथ का अनुमान लगा रही है, जो उनकी विस्तार योजनाओं के कारण ज़्यादा रेवेन्यू और EBITDA की ओर इशारा करती है। फिर भी, यह सेक्टर एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है: इंसेंटिव-आधारित क्षमता वृद्धि से हटकर वास्तविक लागत प्रतिस्पर्धा और सप्लाई चेन स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाना। इस सेक्टर की सफलता सेल उत्पादन के अंतर को पाटने और केवल संरक्षित बाजारों पर निर्भर न रहकर, व्यापक विस्तार करने पर निर्भर करेगी।

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