सरकारी नीतियों की वजह से क्षमता में भारी उछाल
यह सब हुआ सरकारी नीतियों की वजह से। 2020 के बाद से, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम और ALMM जैसी योजनाओं ने सोलर मैन्युफैक्चरिंग को ज़बरदस्त बढ़ावा दिया। नतीजतन, 2020 के मुकाबले मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 13 गुना तक बढ़ गई है। अनुमान है कि 2027 तक यह क्षमता 165 गीगावाट (GW) को पार कर जाएगी, जबकि देश में सालाना सोलर इंस्टॉलेशन की डिमांड करीब 40-50 GW रहने का अनुमान है।
क्षमता का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं, इंडस्ट्री पर दबाव
इस भारी-भरकम ओवरकैपेसिटी का सीधा असर इंडस्ट्री की परफॉरमेंस पर दिख रहा है। सोलर मॉड्यूल प्लांट्स की यूटिलाइजेशन रेट गिरकर 40% पर आ गई है, जो मार्च 2023 से पहले 70% से भी ऊपर थी। यह स्थिति कई मैन्युफैक्चरर्स, खासकर छोटे प्लेयर्स के लिए भारी दबाव बना रही है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA और मार्केट एनालिस्ट्स (Wood Mackenzie) ने इन्वेंटरी बढ़ने और कीमतों में भारी गिरावट की चेतावनी दी है, जो चीन में पहले देखी जा चुकी है।
एक्सपोर्ट बाज़ार में चुनौतियां और कॉस्ट-कॉम्पिटिटिवनेस का सवाल
घरेलू बाज़ार में मची इस होड़ के बीच, एक्सपोर्ट बाज़ार भी भारतीय कंपनियों के लिए मुश्किल हो गए हैं। अमेरिका की नई टैरिफ नीतियों की वजह से सोलर मॉड्यूल एक्सपोर्ट में भारी गिरावट आई है। ऐसे में कई भारतीय कंपनियों को अपनी विदेशी विस्तार योजनाओं पर फिर से विचार करना पड़ रहा है और डोमेस्टिक मार्केट पर फोकस बढ़ाना पड़ रहा है, जिससे घरेलू प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई है। इसके अलावा, ग्लोबल प्लेयर्स के मुकाबले कॉस्ट-कॉम्पिटिटिवनेस (लागत-प्रतिस्पर्धा) हासिल करना भी एक बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इम्पोर्टेड सेल का इस्तेमाल करके भारत में असेंबल किए गए मॉड्यूल, पूरी तरह से इम्पोर्टेड चीनी मॉड्यूल से ज़्यादा महंगे हैं। वहीं, पूरी तरह 'मेड इन इंडिया' मॉड्यूल की लागत चीनी मॉडलों से दोगुनी तक हो सकती है। सिल्वर, एल्युमीनियम और कॉपर जैसी कमोडिटी कीमतों में बढ़ोतरी और रुपए के कमजोर होने से भी मार्जिन पर दबाव है, जिसके चलते RenewSys India और Saatvik Green Energy जैसी कंपनियों को अपने मॉड्यूल की कीमतें बढ़ानी पड़ी हैं।
टेक्नोलॉजी में बदलाव और पॉलिसी का असर
समस्या यहीं खत्म नहीं होती। टेक्नोलॉजी में लगातार हो रहे बदलाव भी एक बड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। भारत की करीब 30 GW मॉड्यूल कैपेसिटी पुरानी और तेज़ी से अप्रचलित हो रही MonoPERC टेक्नोलॉजी पर आधारित है, जिसे अब ज़्यादा एफिशिएंट ToPCon और बाईफेशियल मॉड्यूल से बदला जा रहा है। कंपनियों को कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए महंगी टेक्नोलॉजी अपग्रेड में भारी निवेश करना पड़ रहा है। यह स्थिति मिड-साइज़ कंपनियों के लिए खास तौर पर मुश्किल है। वहीं, सरकारी नियमों के कारण डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट (DCR) वाले मॉड्यूल की कीमतें, नॉन-DCR मॉड्यूल के मुकाबले काफी प्रीमियम पर बिक रही हैं, जो बाज़ार की लागत की बजाय रेगुलेटरी प्रोटेक्शन को दर्शाती है।
बड़े खिलाड़ियों का दबदबा बढ़ेगा, कंसॉलिडेशन तय
इंडस्ट्री के एनालिस्ट्स (ICRA, CRA) का मानना है कि अगले 3 से 5 सालों में इस सेक्टर में बड़ा कंसॉलिडेशन (विलय और अधिग्रहण) देखने को मिलेगा। छोटे और सिर्फ मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों के लिए खतरा सबसे ज़्यादा है, क्योंकि उन्हें अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजी के लिए ज़रूरी R&D और कैपिटल एक्सपेंडिचर (पूंजीगत व्यय) का बोझ उठाना मुश्किल हो सकता है। DCR मॉड्यूल की ऊंची कीमतें डिमांड को कम कर सकती हैं, जिससे कई प्रोजेक्ट्स में देरी हो सकती है। Jakson Ltd (FY2025 में ₹7,150 करोड़ रेवेन्यू) और RenewSys India ( ₹2,420 करोड़ रेवेन्यू) जैसी कंपनियों के फाइनेंशियल हेल्थ की परीक्षा होगी। Saatvik Green Energy जैसी कंपनियां, जिनका P/E रेश्यो करीब 25-33 है, उन्हें सेक्टर-वाइड हेडविंड्स के बीच ग्रोथ बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
आगे का रास्ता
इंडस्ट्री एग्जीक्यूटिव्स का अनुमान है कि मौजूदा ग्लट और टेक्नोलॉजी शिफ्ट के बीच सभी कंपनियां टिक नहीं पाएंगी। भारत के सोलर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का भविष्य कॉस्ट-कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ाने, एक्सपोर्ट बाज़ारों को डाइवर्सिफाई करने और एडवांस्ड टेक्नोलॉजी में इनोवेशन पर निर्भर करेगा। सरकार का घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन को प्राथमिकता देने का फोकस इन चुनौतियों को समझने का संकेत देता है। हालांकि, सस्टेन्ड ग्रोथ इस बात पर निर्भर करेगी कि इंडस्ट्री अपनी विशाल प्रोडक्शन क्षमता को बदलती ग्लोबल और डोमेस्टिक डिमांड के साथ कैसे अलाइन करती है और मैन्युफैक्चरर्स लगातार टेक्नोलॉजिकल ट्रांज़िशन को सफलतापूर्वक कैसे पार करते हैं।