अनुपालन का दबाव
1 जून 2026 से, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने Approved List of Models and Manufacturers (ALMM) लिस्ट-II का सख्ती से पालन कराने का फैसला किया है। इस पॉलिसी के तहत, नेट-मीटरींग और ओपन एक्सेस जैसे सभी सोलर प्रोजेक्ट्स में केवल देश में बने, ALMM-लिस्टेड सोलर सेल्स और मॉड्यूल्स का ही इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा। इसका मतलब है कि डेवलपर्स अब सस्ते विदेशी मॉडल्स का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे और उन्हें लोकल सप्लायर्स की ओर मुड़ना होगा। सरकार का कहना है कि इस नियम से डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और पॉलिसी में स्पष्टता आएगी। हालांकि, डेवलपर्स के लिए असलियत थोड़ी अलग है, जहां एडमिनिस्ट्रेटिव अनिश्चितता और लागत बढ़ने का दबाव है। सरकार ने प्रोजेक्ट्स को रुकने से बचाने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी (NISE) के ज़रिए एक लिमिटेड, केस-बाय-केस अपील प्रोसेस भी शुरू की है। लेकिन, इन अपील्स के लिए सिर्फ इरादा काफी नहीं होगा, बल्कि जमीन अधिग्रहण और ग्रिड अप्रूवल जैसे अहम कदम उठाए जाने के ठोस सबूत पेश करने होंगे।
मैन्युफैक्चरिंग में असंतुलन
भारत ने सोलर PV सेल कैपेसिटी में 40 GW का बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है। लेकिन, देश की इंटरनल सप्लाई चेन अभी भी बिखरी हुई है। सोलर मॉड्यूल असेंबली में तेजी से कैपेसिटी बढ़ी है, जिसे कुछ अनुमानों के मुताबिक 125 GW से ऊपर जाने की उम्मीद है। यह घरेलू सेल प्रोडक्शन की रफ़्तार से कहीं ज़्यादा है। इस असंतुलन के चलते कई मॉड्यूल प्लांट्स अपनी पूरी कैपेसिटी का सिर्फ 30% से 40% ही इस्तेमाल कर पा रहे हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस नियम से सप्लाई में बड़ी रुकावट आ सकती है। घरेलू सेल मैन्युफैक्चरिंग कुछ बड़े प्लेयर्स के हाथों में केंद्रित है। ऐसे में, छोटे और नॉन-इंटीग्रेटेड मॉड्यूल एसेंबलर्स के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है। वे घरेलू मैन्युफैक्चरर्स से ही सेल्स खरीदने को मजबूर हैं, जिनके पास अभी प्राइसिंग पावर काफी ज्यादा है। इससे मार्जिन दब सकता है और छोटे यूटिलिटी-स्केल व रूफटॉप प्रोजेक्ट्स की फिजिबिलिटी पर खतरा मंडराने लगा है।
ओवरकैपेसिटी और इंटीग्रेशन का रिस्क
जहां बड़े, वर्टिकली इंटीग्रेटेड प्लेयर्स इस प्रोटेक्टेड डोमेस्टिक मार्केट से फायदा उठाने की पोजीशन में हैं, वहीं बाकी इंडस्ट्री को स्ट्रक्चरल जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है। 29 GW से ज़्यादा का भारी इन्वेंटरी बंप (Late 2025 तक) सेक्टर पर मंडरा रहा है। इसमें अमेरिका द्वारा लगाए गए हाई टैरिफ के बाद एक्सपोर्ट के घटते मौके भी शामिल हैं। मिड-साइज़ की फर्में, जिनके पास फुल वर्टिकल इंटीग्रेशन नहीं है, वे खासतौर पर कमजोर हैं। उन्हें कंपोनेंट की बढ़ती लागत और सोलर मॉड्यूल के ओवरप्रोडक्शन का दोहरा खतरा है, जिससे लोकल प्राइसेज गिर सकते हैं। इसके अलावा, केस-बाय-केस एक्सटेंशन प्रोसेस में एडमिनिस्ट्रेटिव देरी 'इंस्पेक्टर राज' का जोखिम पैदा करती है। पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPAs) के तहत पेनल्टी लगने से हाईली लीवरेज्ड कंपनियों के लिए लिक्विडिटी क्रंच पैदा हो सकता है।
सेक्टर का आउटलुक और वैल्यूएशन
Websol Energy और Premier Energies जैसे डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरर्स के प्रति मार्केट का सेंटिमेंट इन रेगुलेटरी और ऑपरेशनल रुकावटों के कारण अभी भी मिला-जुला है। कंपनियां बैकवर्ड इंटीग्रेशन में भारी निवेश कर रही हैं, लेकिन इन निवेशों पर रिटर्न डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट्स की सफलता पर निर्भर करेगा। एनालिस्ट्स सेक्टर कंसॉलिडेशन के संकेतों पर नजर रखे हुए हैं, क्योंकि सप्लाई और डिमांड के मौजूदा मिसमैच से लगता है कि केवल हाई ऑपरेशनल एफिशिएंसी और डाइवर्सिफाइड सप्लाई चेन वाली फर्में ही पूरी तरह से लोकलाइज्ड मार्केट में टिक पाएंगी।
