भारत में रूफटॉप सोलर का तूफ़ान! 41 लाख घरों में पहुंची मुफ्त बिजली, 75 लाख का लक्ष्य

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत में रूफटॉप सोलर का तूफ़ान! 41 लाख घरों में पहुंची मुफ्त बिजली, 75 लाख का लक्ष्य
Overview

प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत भारत ने 41 लाख घरों को जोड़ लिया है। सरकार का लक्ष्य दिसंबर 2026 तक 75 लाख घरों तक पहुंचने का है। इस योजना के लिए ₹75,021 करोड़ का बजट रखा गया है और इसे रिकॉर्ड तेज़ी से अपनाया जा रहा है। हालांकि, इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि ग्रिड इंटीग्रेशन और सब्सिडी की पारदर्शिता अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं।

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तेज़ी से बढ़ रहा है सोलर का जाल

भारत में घरों की छतों पर सोलर एनर्जी का इस्तेमाल रिकॉर्ड रफ़्तार से बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना (PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana) के तहत अब तक 41 लाख से ज़्यादा घर जुड़ चुके हैं। मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी (Ministry of New and Renewable Energy) ने दिसंबर 2026 तक यह आंकड़ा 75 लाख घरों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

इस योजना के लागू होने की रफ़्तार इतनी तेज़ हो गई है कि जहां पहले 1 लाख घर जोड़ने में 118 दिन लगते थे, वहीं अब यह काम 8 दिनों से भी कम समय में हो रहा है। मई 2026 में तो रिकॉर्ड 3.16 लाख इंस्टॉलेशन हुए, जो दर्शाता है कि यह स्कीम अब तेज़ी से आगे बढ़ रही है।

'यूटिलिटी-लिंक्ड एग्रीगेशन' मॉडल का असर

इस रफ़्तार को बनाए रखने के लिए सरकार ने 'यूटिलिटी-लिंक्ड एग्रीगेशन' (Utility-Linked Aggregation) मॉडल अपनाया है। इस मॉडल में बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) को सीधे तौर पर शामिल किया गया है, ताकि पेंडिंग 65 लाख एप्लीकेशन्स को क्लियर किया जा सके। यह मॉडल खास तौर पर उन अड़चनों को दूर करने के लिए बनाया गया है जो पहले राज्यों में योजना को लागू करने में आ रही थीं। इस नए सिस्टम के तहत करीब 30 लाख इंस्टॉलेशन की योजना है। सरकार इसमें कम और मध्यम आय वाले परिवारों को प्राथमिकता दे रही है, खासकर 1 किलोवॉट से 3 किलोवॉट की बिजली खपत वाले घरों को, ताकि स्कीम का सामाजिक-आर्थिक असर ज़्यादा से ज़्यादा हो।

क्या हैं असल चुनौतियां?

बड़ी-बड़ी संख्याओं के बावजूद, इस स्कीम में कुछ गंभीर जोखिम भी हैं। आलोचकों का कहना है कि लाभार्थियों की सही जानकारी का अभाव है। आय के आधार पर या सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइलिंग जैसे डेटा की कमी से यह चिंता बढ़ जाती है कि कहीं सब्सिडी का फायदा शहरी मध्यम वर्ग को ज़्यादा न मिले, जबकि गरीब लोग पीछे रह जाएं।

इसके अलावा, DISCOMs पर काम का बोझ बढ़ना भी एक बड़ी समस्या है। जैसे-जैसे ज़्यादा घर खुद बिजली बनाना शुरू करेंगे, वैसे-वैसे क्रॉस-सब्सिडी पूल छोटा होता जाएगा, जिससे पहले से ही परेशान बिजली वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है। जून 2026 से सोलर सेल के लिए 'अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स' (ALMM) की सख्त ज़रूरतें भी इंस्टॉलेशन की लागत बढ़ा सकती हैं। इसका मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है, लेकिन इससे उपभोक्ताओं के लिए टेक्नोलॉजी के विकल्प कम हो सकते हैं और अगर घरेलू सप्लाई की कमी से लागत बढ़ी तो मांग पर असर पड़ सकता है।

आगे का रास्ता

कुल सोलर क्षमता 155 गीगावॉट (GW) से ज़्यादा होने के साथ, भारत रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में एक बड़ा लीडर बन गया है। इस रूफटॉप सोलर स्कीम की सफलता, 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल क्षमता के बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए बहुत ज़रूरी है। फिलहाल, सरकारी मशीनरी पूरी रफ़्तार से काम कर रही है, लेकिन इस प्रोजेक्ट की लॉन्ग-टर्म सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर को कितना स्थिर कर पाती है और यह सुनिश्चित करती है कि तेज़ी से विस्तार के चक्कर में बिजली सेक्टर की सर्विस क्वालिटी या आर्थिक स्थिरता से समझौता न हो।

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