पॉलिसी पर टकराव, योजना अटकी
भारत सरकार अपनी प्रमुख PM-KUSUM योजना को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही है, खासकर इसमें बैटरी स्टोरेज को जोड़ने की बात हो रही है। इसका मकसद यह है कि जब सोलर पावर बनती है (दिन के समय) और जब किसानों को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है (सुबह और शाम), उस वक्त की कमी को पूरा किया जा सके। लेकिन, इस योजना को लागू करने में अभी एक बड़ी अड़चन आ गई है। बिजली मंत्रालय (Ministry of Power) चाहता है कि 4 घंटे की बैटरी स्टोरेज हो, वहीं नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) का सुझाव है कि यह सिर्फ 2 घंटे की हो। इस मतभेद की वजह से इस अहम योजना पर काम रुक गया है।
टारगेट से पीछे चल रही है योजना
असल में, PM-KUSUM योजना में बैटरी स्टोरेज की जरूरत इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि यह अपने शुरुआती लक्ष्यों को हासिल करने में ही पिछड़ रही है। 2019 में शुरू हुई इस योजना का लक्ष्य मार्च 2026 तक 34,800 MW सोलर पावर इंस्टॉल करना था, लेकिन फरवरी 2026 तक केवल लगभग 12,164 MW ही लग पाया है। अकेले सोलर पंप (Component B) में थोड़ी अच्छी प्रोग्रेस दिखी है, लेकिन कुल मिलाकर टारगेट का सिर्फ 30% ही पूरा हो पाया है। ज़मीन की ऊंची कीमतें, किसानों के लिए फाइनेंस की दिक्कतें और सही तालमेल न होने जैसे कारणों ने इस योजना की रफ्तार धीमी कर दी है।
सस्ती हो रहीं हैं बैटरीज
अच्छी बात यह है कि बैटरी स्टोरेज अब काफी सस्ता हो गया है। भारत में बैटरी स्टोरेज सिस्टम की लागत में भारी गिरावट आई है। जहां 2022-23 में टैरिफ लगभग ₹10.18 प्रति किलोवॉट-घंटा (kWh) था, वहीं हाल की बोलियों में यह घटकर लगभग ₹2.1 प्रति kWh तक आ गया है। बाजार के आंकड़े बताते हैं कि सामान्य इस्तेमाल के लिए स्टोरेज की लागत करीब ₹2.8 प्रति kWh है, जो सोलर पावर की कीमतों के मुकाबले काफी मुकाबला कर सकती है। सरकार का सपोर्ट, जैसे कि वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) और लिंक प्रोजेक्ट्स के लिए ट्रांसमिशन शुल्क में छूट, भी स्टोरेज को बढ़ावा दे रहा है।
नीतियों में मतभेद और अमल की चिंताएं
नवीकरणीय ऊर्जा के प्रबंधन में हो रहे बदलावों के बीच स्टोरेज को बढ़ाने का यह कदम उठाया जा रहा है। MNRE चाहता है कि रिन्यूएबल एनर्जी की प्लानिंग, मार्केट रूल्स और प्राइसिंग पर उसका कंट्रोल बढ़े। PM-KUSUM 2.0 के लिए स्टोरेज घंटों पर चल रहा यह झगड़ा दिखाता है कि कैसे सरकारी विभागों में तालमेल की कमी नीतिगत निर्णय लेने में रुकावट बन सकती है। इसके अलावा, स्टोरेज ऑक्शन में कम बोलियां आना और पावर डील व ग्रिड कनेक्शन पर धीमी प्रगति जैसी चिंताएं भी बनी हुई हैं। इन सब दिक्कतों को देखते हुए, नई तकनीक जैसे बैटरी स्टोरेज तभी सफल हो पाएगी जब सरकारी विभागों में ठोस सहमति बने और ज़मीनी स्तर पर काम सही तरीके से हो।
आगे का रास्ता: पॉलिसी और ग्रोथ का संतुलन
भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल एनर्जी तक पहुंचना है, जिसके लिए एनर्जी स्टोरेज बहुत अहम है। सोलर पावर को खेती के साथ जोड़ना (एग्रीवोल्टेक्स) भी एक अच्छा तरीका साबित हो सकता है। लेकिन, PM-KUSUM 2.0 और ऐसे दूसरे प्रोजेक्ट्स की सफलता के लिए सिर्फ सस्ती तकनीक ही काफी नहीं है। सरकारी मंत्रालयों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना और उन अमल संबंधी समस्याओं को ठीक करना होगा, जिनकी वजह से भारत की नवीकरणीय ऊर्जा की प्रगति धीमी रही है। सोलर पावर की क्षमता तेज़ी से बढ़ रही है, लेकिन रेगुलेटरी मुद्दों को हल करना और प्रोजेक्ट्स को प्रभावी ढंग से बनाना देश के साफ ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।