जुलाई और अगस्त **2026** में ग्रिड इन्फ्रास्ट्रक्चर की देरी के चलते **1,835 मिलियन यूनिट** रिन्यूएबल एनर्जी बर्बाद हो गई। पावर जेनरेशन और ट्रांसमिशन क्षमता के बीच के इस फासले से डेवलपर्स के लिए रेवेन्यू का खतरा पैदा हो गया है।
भारत का रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन एक बड़ी व्यावहारिक समस्या सामने आई है—ग्रिड अभी इस बिजली के बड़े फ्लो को संभालने के लिए तैयार नहीं है। जुलाई और अगस्त 2026 के दौरान देश में 1,835 मिलियन यूनिट क्लीन इलेक्ट्रिसिटी बर्बाद हो गई। इंडस्ट्री की भाषा में इसे 'कर्टेलमेंट' (curtailment) कहते हैं। इसमें 1,462 मिलियन यूनिट सोलर पावर और 373 मिलियन यूनिट विंड पावर शामिल है, जिसे ग्रिड तक पहुंचाया ही नहीं जा सका, जबकि बाजार में इसकी मांग मौजूद थी। केवल सोलर प्रोजेक्ट्स की बात करें तो यह कुल जेनरेशन का लगभग 4.2% था।
डेवलपर्स पर फाइनेंशियल असर
निवेशकों के लिए, यह बर्बादी सीधे तौर पर रेवेन्यू का रिस्क है। जब पावर प्लांट बिजली बनाने के लिए तैयार हो, लेकिन ट्रांसमिशन लाइन उसे ले जाने में असमर्थ हो, तो डेवलपर बिजली बेच नहीं पाता। कई लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स में इस नुकसान की भरपाई को लेकर क्लैरिटी की कमी है। यदि बिजली ट्रांसमिट नहीं हो पाती, तो प्रोजेक्ट बेकार बैठा रहता है, जिससे कैश फ्लो अनुमान से कम हो जाता है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर की सुस्ती
इस बर्बादी की मुख्य वजह यह है कि ट्रांसमिशन इन्फ्रास्ट्रक्चर, जेनरेशन क्षमता की रफ्तार से नहीं बन रहा है। 2026 के मध्य तक, लगभग एक-तिहाई नए रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स ग्रिड कनेक्टिविटी से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे थे। अक्सर प्लांट तो तैयार हो जाते हैं, लेकिन हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइनें बिजली ले जाने के लिए तैयार नहीं होतीं।
PM-Dhara स्कीम का सहारा
इस समस्या को दूर करने के लिए, सरकार ने 30 सितंबर 2026 को ₹1.86 लाख करोड़ के भारी-भरकम बजट के साथ PM-Dhara स्कीम लॉन्च की है। इस प्रोग्राम का मकसद ट्रांसमिशन लाइनों और स्टोरेज सॉल्यूशंस के निर्माण में तेजी लाना है ताकि रिन्यूएबल पावर को नेशनल ग्रिड से जोड़ा जा सके।
निवेशकों के लिए आगे क्या?
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी है यह देखना कि PM-Dhara स्कीम के प्रोजेक्ट्स कितनी तेजी से पूरे होते हैं। जो कंपनियां ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर में हैं, उनके ऑर्डर बुक में बढ़ोतरी की संभावना है। वहीं, रिन्यूएबल एनर्जी जनरेटर्स के लिए यह ट्रैक करना जरूरी है कि उनके प्रोजेक्ट्स पर ग्रिड कंस्ट्रेंट्स का कितना असर पड़ रहा है।
