भारत की एनर्जी स्टोरेज को पंख लगाती नीतियां
सरकारी नीतियां इस विस्तार को पंख लगा रही हैं। एनर्जी स्टोरेज ऑब्लिगेशन्स (ESO), वायबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) जैसे कदम और इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स 2025 में स्टोरेज को औपचारिक दर्जा मिलने से निवेशकों का जोखिम कम होगा और डिप्लॉयमेंट (deployment) तेज होगी। यह भारत के रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बेहद जरूरी है।
खास तौर पर, स्टैंडअलोन बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स (BESS) के लिए ₹5,400 करोड़ की VGF और 2028 तक इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन (ISTS) चार्ज वेवर जैसे कदम इसे और रफ्तार देंगे। इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स 2025 उपभोक्ताओं को एनर्जी स्टोरेज के अधिकार भी देता है और ग्रिड कनेक्शन्स को आसान बनाता है। यह सब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रिड की मांग में 90 गीगावाट तक का उतार-चढ़ाव आ सकता है, जिससे स्टेबिलिटी के लिए बड़े पैमाने पर स्टोरेज जरूरी हो जाता है।
BESS प्रोजेक्ट्स की पाइपलाइन अब रिकॉर्ड 92 GWh तक पहुंच गई है। अकेले 2025 में, 69 नए टेंडर्स जारी किए गए, जिनकी कुल क्षमता 102 GWh थी। यह पिछले साल के मुकाबले 35% ज्यादा है। वैश्विक स्तर पर देखें तो एशिया पैसिफिक क्षेत्र 2024 में स्टेशनरी एनर्जी स्टोरेज मार्केट में 51% हिस्सेदारी के साथ सबसे आगे है।
पांप्ड हाइड्रो का अहम रोल
बैटरी के अलावा, पांप्ड हाइड्रो एनर्जी स्टोरेज (PHES) भी लॉन्ग-ड्यूरेशन स्टोरेज में बड़ी भूमिका निभाएगा। 2025 में 7 GW की क्षमता से यह 2033 तक 107 GW तक पहुंचने का अनुमान है। PHES को भारत का सबसे कॉस्ट-इफेक्टिव लॉन्ग-ड्यूरेशन स्टोरेज समाधान माना जाता है, जिसकी लाइफसाइकिल कॉस्ट BESS की तुलना में कम है और यह 8-10 घंटे की क्षमता प्रदान कर सकता है। यह भारत के 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल जनरेशन के लक्ष्य के लिए अहम है। हालांकि, PHES प्रोजेक्ट्स के कंप्लीशन रेट्स चिंता का विषय हैं; 91 में से केवल छह प्रोजेक्ट पूरे हुए हैं और 17 निर्माणाधीन हैं।
मार्केट का बड़ा दांव
भारतीय एनर्जी स्टोरेज मार्केट में जबरदस्त फाइनेंशियल प्रॉमिस है। BESS मार्केट 2031 तक $8.59 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है, जो 33.2% के कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा। वहीं, व्यापक रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज मार्केट 2034 तक $7.84 बिलियन तक पहुंच सकता है ( 11.04% CAGR)। कुल मिलाकर, 2030 तक भारतीय एनर्जी स्टोरेज मार्केट का मूल्य $120 बिलियन से $130 बिलियन के बीच रहने का अनुमान है।
एग्जीक्यूशन रिस्क: महत्वाकांक्षा के सामने खड़ी चुनौतियां
इतने बड़े लक्ष्यों के बावजूद, सेक्टर काफी एग्जीक्यूशन रिस्क का सामना कर रहा है। 2021 से अब तक 83 GWh BESS टेंडर किए गए हैं, लेकिन केवल 18 GWh पर काम चल रहा है, और सितंबर 2025 तक सिर्फ 500 MWh ऑपरेशनल होंगे। यह प्रोजेक्ट्स में भारी देरी को दर्शाता है। मार्केट डिजाइन में खामियों के चलते लगभग 50% स्टैंडअलोन BESS प्रोजेक्ट्स नेगेटिव रिटर्न दिखा रहे हैं। आक्रामक अंडरबिडिंग एक बड़ी समस्या है; टैरिफ्स 2022 में ₹10.84 लाख/MW/month से घटकर 2024 में ₹4.49 लाख/MW/month हो गए हैं, जो प्रोजेक्ट्स की वायबिलिटी पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरणीय अड़चनें
इसके अलावा, हाई फाइनेंसिंग कॉस्ट, टेक्नोलॉजी रिस्क ( 200-300 bps ) और परफॉर्मेंस अनसर्टेनिटीज ( 150-200 bps ) प्रोजेक्ट इकोनॉमिक्स को और मुश्किल बना रहे हैं। ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी एक बड़ा बॉटलनेक है, जहां करीब 50 GW रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी के पास पर्याप्त ग्रिड कनेक्शन नहीं है।
पर्यावरणीय चुनौतियां भी कम नहीं हैं। राजस्थान और गुजरात जैसे इलाकों में अत्यधिक गर्मी ( 40-50°C से ऊपर) बैटरी के डिग्रेडेशन को बढ़ा सकती है, कैपेसिटी कम कर सकती है और कूलिंग सिस्टम के लिए अतिरिक्त पावर ( 3-6% ) की मांग कर सकती है। साथ ही, इंपोर्टेड बैटरी मैटेरियल्स पर निर्भरता सप्लाई चेन को कमजोर बनाती है।
भविष्य की राह
2026 से 2032 के बीच भारत के एनर्जी स्टोरेज सेक्टर में पांच गुना बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिसके लिए अनुमानित INR 479 हजार करोड़ के इन्वेस्टमेंट की जरूरत होगी। सरकार VGF और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेन्टिव्स (PLI) जैसे इंसेंटिव्स के जरिए लगातार सपोर्ट कर रही है।
हालांकि, 2026 में टेंडरिंग से एक्चुअल प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन की ओर बढ़ते हुए सेक्टर अपनी क्षमता साबित करेगा, खासकर कॉस्ट अनिश्चितताओं और फाइनेंसिंग चुनौतियों के बीच। इन एग्जीक्यूशन रिस्क और इंफ्रास्ट्रक्चर गैप को दूर करना भारत की एनर्जी ट्रांजिशन क्षमता को अनलॉक करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
