भारत में ALMM List-II के लागू होने के बाद चीनी सोलर सेल के आयात में **98%** की भारी गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि सरकार का मकसद घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है, लेकिन सेल और मॉड्यूल की प्रोडक्शन क्षमता के बीच का फासला सप्लाई चेन के लिए एक नई चुनौती बन गया है।
आत्मनिर्भर भारत का असर
जून 2026 से प्रभावी हुए ALMM (Approved List of Models and Manufacturers) नियमों ने सोलर इंडस्ट्री का चेहरा बदल दिया है। अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच चीनी सोलर सेल का इम्पोर्ट 98% तक सिमट गया है। इस सख्ती का मुख्य उद्देश्य सरकारी, ओपन-एक्सेस और नेट-मीटरिंग प्रोजेक्ट्स में घरेलू सेल का उपयोग अनिवार्य करना है।
क्षमता का फासला (Capacity Gap)
अक्टूबर 2026 तक भारत की घरेलू सोलर सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 37.8 GW तक पहुंच चुकी है, लेकिन यह अभी भी देश के बड़े सोलर मॉड्यूल प्रोडक्शन बेस के लिए पर्याप्त नहीं है। यह 'मिसमैच' एक बड़ा बॉटलनेक (Bottleneck) बना हुआ है, जहां मॉड्यूल बनाने वाली कंपनियों को सेल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।
प्रोजेक्ट्स पर रिस्क
EPC कंपनियों के लिए यह स्थिति मुश्किल पैदा कर सकती है। अगर घरेलू कंपनियां मांग के अनुसार सेल प्रोडक्शन नहीं बढ़ा पाईं, तो बड़े सोलर पार्कों के कमीशनिंग में देरी और लागत में बढ़ोतरी का खतरा है।
निवेशक क्या ट्रैक करें?
मार्केट अभी ट्रांजिशन फेज में है। नेट-मीटरिंग और ओपन-एक्सेस प्रोजेक्ट्स को 31 दिसंबर 2026 तक गैर-ALMM सेल इस्तेमाल करने की छूट दी गई है। यह तारीख निवेशकों के लिए बेहद अहम है क्योंकि इसके बाद नियमों का पूरी तरह से पालन अनिवार्य होगा। फिलहाल, निवेशकों की नजर घरेलू कंपनियों की विस्तार योजनाओं और मंथली प्रोडक्शन डेटा पर बनी हुई है।
