ग्लोबल टेक दिग्गज अब अपने डेटा सेंटर ऑपरेशंस को भारत की ओर शिफ्ट कर रहे हैं, जिससे ग्रीन पावर (Green Power) की मांग में बड़ा उछाल आया है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि साल 2030 तक AI-लिंक्ड डेटा सेंटर कैपेसिटी **6.5 गीगावाट** तक पहुँच जाएगी।
भारत तेजी से ग्लोबल डेटा सेंटर इन्वेस्टमेंट का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है, जिसके पीछे मुख्य कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की पावर जरूरतें और बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियां हैं। Meta, Google, Apple और Amazon जैसी बड़ी कंपनियां अपने इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के लिए भारत को प्राथमिकता दे रही हैं। अमेरिका में नियामक चुनौतियां और मिडिल ईस्ट में अस्थिरता के कारण इन कंपनियों के लिए भारत एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प बनकर उभरा है।
पावर की विशाल जरूरतें
AI के लिए बिजली की मांग ट्रेडिशनल डेटा सेंटर्स के मुकाबले काफी ज्यादा है। इंडस्ट्री एनालिसिस के अनुसार, 1 गीगावाट डेटा सेंटर कैपेसिटी के लिए कंपनियों को लगभग 3 गीगावाट सोलर पावर, 3 गीगावाट विंड पावर और 3 गीगावाट-घंटे की बैटरी स्टोरेज की आवश्यकता होती है। CleanMax Enviro Energy Solutions जैसी कंपनियां हर साल 1.5 गीगावाट की कैपेसिटी लगा रही हैं, जिसके लिए उन्हें हर साल ₹9,000 करोड़ से अधिक का निवेश करना पड़ रहा है।
पावर कॉन्ट्रैक्ट्स में बदलाव
बड़ी टेक कंपनियां अब सीधी बिजली आपूर्ति के बजाय लचीले 'प्रोक्योरमेंट मॉडल' को अपना रही हैं। इसमें टेक दिग्गज एक निश्चित टैरिफ और बिजली की वास्तविक मार्केट कीमत के बीच के अंतर का भुगतान करते हैं। यह मॉडल रिन्यूएबल एनर्जी प्रोड्यूसर्स के लिए फायदेमंद है क्योंकि इससे उन्हें एक फिक्स्ड रेवेन्यू मिलता है, जबकि टेक कंपनियों को कार्बन फुटप्रिंट मैनेजमेंट में आसानी होती है।
भविष्य की ग्रोथ और जोखिम
Wood Mackenzie की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में AI-स्पेसिफिक डेटा सेंटर कैपेसिटी 24 गुना बढ़कर 6.5 गीगावाट तक हो सकती है। फिलहाल 1.3 गीगावाट की IT कैपेसिटी पर काम चल रहा है। हालांकि, निवेशकों को सावधान रहने की जरूरत है। बड़े प्रोजेक्ट्स में जमीन अधिग्रहण, सरकारी मंजूरी और ग्रिड कनेक्टिविटी में देरी के जोखिम बने रहते हैं। इसके अलावा, इतनी तेज विस्तार के लिए लिया गया भारी कर्ज (Debt) और कच्चे माल की बदलती कीमतें कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकती हैं।
