Indian Flexible Office Firms: अब सोलर पावर से चमकेगा ऑफिस का बिजनेस, IndiQube और WeWork का बड़ा दांव

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AuthorAditya Rao|Published at:
Indian Flexible Office Firms: अब सोलर पावर से चमकेगा ऑफिस का बिजनेस, IndiQube और WeWork का बड़ा दांव

IndiQube, WeWork India और Table Space जैसी बड़ी वर्कस्पेस कंपनियां अब अपनी बिजली खुद पैदा करने की राह पर हैं। इन कंपनियों ने अपने बिजली खर्च को कम करने और कॉर्पोरेट क्लाइंट्स के नेट-जीरो टारगेट को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर कैप्टिव सोलर प्लांट्स में निवेश करना शुरू कर दिया है।

भारत में मैनेज्ड वर्कस्पेस प्रोवाइडर्स अपनी एनर्जी स्ट्रेटेजी को पूरी तरह बदल रहे हैं। अब ये कंपनियां छत पर लगे छोटे सोलर पैनलों से आगे बढ़कर बड़े स्तर के 'कैप्टिव सोलर फार्म्स' की तरफ रुख कर रही हैं। इसकी बड़ी वजह बिजली के बढ़ते खर्च और कॉर्पोरेट क्लाइंट्स की सस्टेनेबल ऑफिस स्पेस की बढ़ती मांग है।

प्रमुख कंपनियों की तैयारी

IndiQube इस बदलाव में सबसे आगे दिख रही है। कंपनी के पास अभी 30 मेगावाट की ऑपरेशनल सोलर कैपेसिटी है और चालू फाइनेंशियल ईयर में वह 30 मेगावाट और जोड़ने की योजना बना रही है। कंपनी का फोकस मुख्य रूप से कर्नाटक, महाराष्ट्र और तमिलनाडु पर है। वहीं, WeWork India कर्नाटक में 10 मेगावाट का प्लांट लगा रही है, जिससे उसकी कुल खपत में रिन्यूएबल एनर्जी का हिस्सा 50% तक पहुँचने की उम्मीद है। इसी राह पर चलते हुए Table Space ने Clean Max और AMPYR Energy जैसी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप की है।

बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव

इन निवेशों का मुख्य मकसद लॉन्ग-टर्म लागत में स्थिरता लाना है। ऑफ-साइट कैप्टिव सोलर प्रोजेक्ट्स के जरिए ये कंपनियां अगले 25 साल तक बिजली की उत्पादन लागत को लॉक कर सकती हैं। यह बिजली को एक वेरिएबल खर्च से बदलकर एक कंट्रोल और प्रिडिक्टेबल एसेट बनाने जैसा है। आज के दौर में बड़े एंटरप्राइज क्लाइंट्स के लिए ESG मैंडेट्स बहुत जरूरी हैं, और ये ऑफिस स्पेस उनकी कार्बन फुटप्रिंट रिपोर्टिंग में बड़ी मदद करते हैं।

जोखिम और चुनौतियां

हालांकि, यह राह आसान नहीं है। यह सेक्टर स्टेट-लेवल की सोलर और ओपन-एक्सेस पॉलिसीज पर बहुत अधिक निर्भर है। रेगुलेटरी बदलावों के कारण इन प्रोजेक्ट्स की व्यवहार्यता या लागत पर असर पड़ सकता है। साथ ही, इनमें भारी मात्रा में अपफ्रंट कैपिटल की जरूरत होती है, जो कंपनी की बैलेंस शीट पर दबाव डाल सकती है। निवेशकों की नजर अब इस पर टिकी है कि ये कंपनियां इन प्रोजेक्ट्स के कैपिटल खर्च और रेवेन्यू ग्रोथ के बीच कैसे संतुलन बनाए रखती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.