सरकार अपने महत्वाकांक्षी PM-KUSUM 2.0 प्रोग्राम में एग्रीवोल्टिक्स (Agrivoltaics) को शामिल करने की तैयारी में है। इसका लक्ष्य **10 GW** की क्षमता हासिल करना है, जिससे किसान एक ही जमीन से खेती और बिजली, दोनों का लाभ उठा सकेंगे।
भारतीय सरकार PM-KUSUM योजना के दूसरे चरण में 'एग्रीवोल्टिक्स' को विशेष प्राथमिकता देने जा रही है। इस नई नीति की विस्तृत जानकारी 21 से 23 अक्टूबर, 2026 के बीच नई दिल्ली में होने वाले 7वें एग्रीवोल्टिक्स वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस में दी जा सकती है। यह पहल न केवल जमीन की कमी की समस्या को हल करेगी, बल्कि किसानों के लिए कमाई के नए रास्ते खोलेगी।
कैसे काम करेगा यह डुअल-यूटिलिटी मॉडल?
एग्रीवोल्टिक्स के तहत खेतों में 18 से 20 फीट ऊंचे खंभों पर सोलर पैनल लगाए जाएंगे। यह ऊंचाई इतनी होगी कि बड़े कृषि उपकरण आसानी से नीचे काम कर सकें। Jain Irrigation जैसी कंपनियों के पायलट प्रोजेक्ट्स यह साबित कर चुके हैं कि फलों और सब्जियों की खेती के साथ बिजली उत्पादन का यह मॉडल पूरी तरह सफल है।
लागत और आर्थिक समीकरण
इस तकनीक में सामान्य सोलर पार्क की तुलना में लगभग 30% अधिक कैपिटल स्पेंडिंग (CAPEX) की जरूरत होती है। हालांकि, यह किसानों को तीन तरह की कमाई का मौका देता है: फसल की बिक्री, बिजली बेचकर होने वाली आय और सिंचाई के लिए डीजल पंपों पर निर्भरता कम करके बचत। निवेशकों के लिए यह सेक्टर नई संभावनाएं लेकर आ रहा है, लेकिन सब कुछ सरकार द्वारा तय की जाने वाली सब्सिडी और कांट्रैक्ट्स पर निर्भर करेगा।
जोखिम और निगरानी
इन्वेस्टर्स को यह भी ध्यान रखना होगा कि एग्रीवोल्टिक्स में ऑपरेशनल रिस्क भी हैं। यदि डिजाइन सही नहीं हुआ, तो फसल की पैदावार कम हो सकती है, जो इस प्रोजेक्ट के मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा। अभी यह इंडस्ट्री शुरुआती चरण में है, इसलिए कानूनी अनुबंधों और राजस्व बंटवारे (Revenue Sharing) के नियमों को समझना बेहद जरूरी है। बाजार की नजरें अब सरकार द्वारा जारी होने वाली गाइडलाइंस पर टिकी हैं कि डेवलपर्स के लिए प्रोत्साहन का दायरा क्या होगा।
