भारत रिन्यूएबल एनर्जी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है। 2030 तक सोलर और विंड पावर को अपनाकर देश कोयला और नेचुरल गैस के आयात पर **$240 बिलियन** की भारी बचत करेगा।
भारत अपनी रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी को आक्रामक तरीके से बढ़ाने की योजना पर काम कर रहा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत कोयला और नेचुरल गैस के आयात पर लगभग $240 बिलियन की बचत करने की राह पर है। गौर करने वाली बात यह है कि 2011 से अब तक रिन्यूएबल सेक्टर ने देश को $100 बिलियन से ज्यादा का इंपोर्ट खर्च बचाने में मदद की है।
लक्ष्य और बड़े आंकड़े
सरकार का लक्ष्य 2030 तक 530 गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी हासिल करना है। इसमें 350 गीगावाट सोलर, 90 गीगावाट विंड और 75 गीगावाट हाइड्रोपावर का बड़ा योगदान होगा। अकेले 2025 में, रिन्यूएबल कैपेसिटी ने भारत को 11 करोड़ टन कोयले के आयात से बचा लिया है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
निवेशकों को इस सेक्टर के मैक्रो-इकोनॉमिक फायदों के साथ-साथ जमीनी हकीकत को भी समझना होगा। ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी स्टोरेज सिस्टम के लिए लगभग $220 बिलियन के भारी निवेश की जरूरत है।
इसके अलावा, निवेशकों को इन 3 बड़े रिस्क पर नजर रखनी चाहिए:
- प्रोजेक्ट देरी: जमीन अधिग्रहण और ग्रिड कनेक्टिविटी के कारण प्रोजेक्ट्स पूरा होने में 17 से 26 महीने का समय लग जाता है, जिससे लागत बढ़ती है।
- डेट (Debt) का बोझ: रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स का बड़ा हिस्सा बैंक लोन पर टिका है, जिससे कंपनियों पर कर्ज का दबाव ज्यादा है।
- DISCOMs की हालत: सरकारी पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों (DISCOMs) की आर्थिक स्थिति अभी भी चिंता का विषय है। पेमेंट में देरी होने से पावर प्रोड्यूसर्स के कैश फ्लो पर बुरा असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए भविष्य में कंपनियों के डेट मैनेजमेंट और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों से समय पर भुगतान मिलने की प्रक्रिया पर नजर रखना सबसे महत्वपूर्ण होगा।
