सरकार PM-KUSUM स्कीम के तहत खेती को सोलर पावर से जोड़ने की तैयारी कर रही है। मार्च **2026** तक **34.8 GW** का लक्ष्य रखा गया है, जिससे सोलर पंप बनाने वाली कंपनियों को बड़ा बूस्ट मिल सकता है।
भारत अब खेती में सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बड़ी तेजी से आगे बढ़ा रहा है। सरकार का टारगेट है कि मार्च 2026 तक एग्रीकल्चर सेक्टर में 34.8 GW की सोलर कैपेसिटी हासिल की जाए। इस बदलाव का मुख्य जरिया PM-KUSUM स्कीम है, जो महंगे डीजल पंपों को हटाकर सोलर पंप लगाने पर जोर दे रही है। यह उन कंपनियों के लिए एक बड़ा मौका है जो रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर और सोलर इक्विपमेंट के कारोबार में हैं।
बिजनेस मॉडल और चुनौतियां
इस मिशन के दो बड़े पिलर हैं: स्टैंडअलोन सोलर पंप और ग्रिड से जुड़े पंपों का सोलर-करण। ग्रिड से जुड़े पंपों का फायदा यह है कि किसान बिजली बेचकर एक्स्ट्रा इनकम भी कर सकते हैं। लेकिन, सेक्टर की हकीकत थोड़ी जटिल है। सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) की आर्थिक स्थिति अक्सर खराब रहती है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को पेमेंट मिलने में देरी हो सकती है। निवेशकों के लिए लिक्विडिटी का यह मुद्दा सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
ग्राउंडवाटर और एग्रीवोल्टेक्स (Agrivoltaics) का जोखिम
सोलर पंप से बिजली सस्ती और आसान होने के कारण ग्राउंडवाटर के अत्यधिक दोहन का खतरा भी बढ़ गया है। इसे रोकने के लिए सरकार अब माइक्रो-इरिगेशन को सोलर के साथ अनिवार्य कर रही है। वहीं, 'एग्रीवोल्टेक्स' (खेती और सोलर पैनल का एक साथ इस्तेमाल) एक नई स्ट्रैटेजी है। हालांकि, अगर पैनल की डेंसिटी सही नहीं रही, तो फसल की पैदावार कम हो सकती है।
फाइनेंसिंग की जरूरत
छोटे किसानों के लिए सबसे बड़ी बाधा इक्विपमेंट का शुरुआती खर्च है। सरकारी सब्सिडी के बावजूद, उन्हें क्रेडिट की जरूरत है। इस सेक्टर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) ग्रामीण इलाकों में कितनी प्रभावी तरीके से फाइनेंसिंग स्ट्रक्चर तैयार करती हैं।
