भारत का विंड एनर्जी सेक्टर अब 2035 तक **300 GW** क्षमता हासिल करने की तैयारी कर रहा है, जो मौजूदा **59.2 GW** से कहीं ज्यादा है। Windergy 2026 कॉन्फ्रेंस में पुराने टर्बाइनों को बदलने और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर जोर दिया गया है, लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर और पॉलिसी के मोर्चे पर चुनौतियां भी बरकरार हैं।
भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर ने एक बड़ा लक्ष्य तय किया है। Windergy 2026 कॉन्फ्रेंस में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, देश अब 2030 के 100 GW वाले पुराने लक्ष्य से आगे बढ़कर 2035 तक 300 GW की विंड एनर्जी क्षमता का लक्ष्य बना रहा है। फिलहाल भारत की इंस्टॉल की गई क्षमता 59.2 GW है, जबकि 43 GW के प्रोजेक्ट्स पाइपलाइन में हैं, जो इस सेक्टर की तेजी को दर्शाते हैं।
रीपावरिंग और ऑफशोर का दांव
लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सरकार 25 GW पुरानी क्षमता की 'रीपावरिंग' (Repowering) पर फोकस कर रही है। इसमें पुराने टर्बाइनों को नए और ताकतवर टर्बाइनों से बदला जाएगा। इसके अलावा, तमिलनाडु जैसे राज्यों के तटीय इलाकों में 'ऑफशोर' (Offshore) विंड प्रोजेक्ट्स पर भी नजरें हैं। हालांकि, इनकी लागत ज्यादा होती है, इसलिए सरकार को पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPAs) को लेकर स्पष्टता देनी होगी।
लोकल मैन्युफैक्चरिंग की बढ़ती ताकत
भारत अब दुनिया का विंड टर्बाइन मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की राह पर है। वर्तमान में डोमेस्टिक लोकलाइजेशन 65% है, जिसे बढ़ाकर 85% करने का लक्ष्य है। इससे विदेशी पार्ट्स पर निर्भरता कम होगी और लोकल कंपनियों के मार्जिन में सुधार देखने को मिल सकता है।
निवेश के जोखिम और चुनौतियां
निवेशकों को कुछ जमीनी हकीकतों पर नजर रखनी चाहिए:
- ग्रिड इन्फ्रास्ट्रक्चर: बिजली उत्पादन के बावजूद, अगर ट्रांसमिशन लाइनें तैयार नहीं हैं, तो रेवेन्यू नहीं आएगा।
- Discoms की सेहत: सरकारी बिजली वितरण कंपनियों (Discoms) की आर्थिक स्थिति खराब रहने पर पेमेंट में देरी हो सकती है, जिससे पावर डेवलपर्स का कैश फ्लो अटक सकता है।
- जमीन अधिग्रहण: बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए लैंड एक्विजिशन हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है।
मार्केट का अनुमान है कि सालाना इंस्टालेशन इस फाइनेंशियल ईयर के 6 GW से बढ़कर FY31 तक 13 GW से ज्यादा हो जाएगा, बशर्ते पॉलिसी सपोर्ट और एग्जीक्यूशन समय पर पूरा हो।
