रिकॉर्ड क्षमता का उभार
जनवरी से मार्च 2026 तक की तिमाही में भारत के सौर ऊर्जा सेक्टर ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया है। इस दौरान रिकॉर्ड 15.3 गीगावाट (GW) की नई सौर क्षमता स्थापित की गई, जो पिछले साल इसी अवधि में जोड़े गए 6.3 GW की तुलना में 143% अधिक है। पिछले तिमाही (Q4 2025) से भी यह 49% की वृद्धि दर्शाता है। कुल नई बिजली क्षमता में सौर ऊर्जा का दबदबा 77% रहा, जिससे मार्च 2026 तक भारत की कुल स्थापित सौर क्षमता 152 GW तक पहुँच गई। अब यह देश की कुल बिजली क्षमता का 28% और नवीकरणीय ऊर्जा का 55% हिस्सा बन गया है।
पॉलिसी डेडलाइन का असर
इस रिकॉर्ड तोड़ गति के पीछे मुख्य वजह जून 2026 से लागू होने वाली अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) List-II है, जिसके तहत सरकारी परियोजनाओं में घरेलू स्तर पर निर्मित सोलर सेल वाले मॉड्यूल का उपयोग अनिवार्य होगा। डेवलपर्स ने मौजूदा नियमों के तहत परियोजनाओं को पूरा करने की जल्दी की, क्योंकि उन्हें घरेलू कंटेंट की उपलब्धता और मॉड्यूल की बढ़ती लागतों की चिंता थी। इसके अलावा, इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) चार्ज में संभावित कटौती और PM-KUSUM प्रोग्राम के तहत जारी काम ने भी परियोजनाओं को बढ़ावा दिया। गुजरात और राजस्थान, इन दोनों राज्यों ने मिलकर इस तिमाही में लगभग 79% बड़ी सौर परियोजनाओं का योगदान दिया, जिसमें गुजरात का हिस्सा करीब 40% और राजस्थान का 39% रहा।
भविष्य के प्रोजेक्ट्स में गिरावट
रिकॉर्ड इंस्टॉलेशन के बावजूद, भविष्य के प्रोजेक्ट्स के लिए एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है: भविष्य की प्रोजेक्ट पाइपलाइन के विकास में भारी मंदी। Q1 2026 में सोलर टेंडर की घोषणाओं में पिछले साल की तुलना में 68% की बड़ी गिरावट आई और यह घटकर सिर्फ 3 GW रह गई। इसी तरह, ऑक्शन (नीलामी) की गई सौर क्षमता में 64% की गिरावट देखी गई, जो 4 GW पर आ गई। भविष्य के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक, नई परियोजना गतिविधियों में यह बड़ी गिरावट, Q1 इंस्टॉलेशन बूम के बिल्कुल विपरीत है और यह संकेत देता है कि आने वाली तिमाहियों में क्षमता वृद्धि धीमी हो सकती है।
लागत का दबाव और वैल्यूएशन की चिंता
TOPCon DCR मॉड्यूल का उपयोग करने वाली बड़ी सौर परियोजनाओं की औसत लागत तिमाही-दर-तिमाही थोड़ी कम होने के बावजूद, पिछले साल के स्तर से 6% अधिक रही, जो लागत के दबाव को दर्शाती है। भारत का सौर ऊर्जा बाजार, जो 2026 तक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बनने की ओर अग्रसर है, इसमें NTPC, Adani Green Energy, JSW Energy और Tata Power जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। NTPC का P/E रेश्यो लगभग 15.4x-24.1x है, जो अधिक सतर्क दिखता है। वहीं, Adani Green Energy का P/E रेश्यो 130x-146x (TTM) बहुत अधिक है, जो उच्च वृद्धि की उम्मीदें दिखाता है लेकिन वैल्यूएशन जोखिम भी पैदा करता है। JSW Energy और Tata Power भी क्रमशः 32.8x-41.4x और 34.7x-37.5x के प्रीमियम P/E मल्टीपल पर ट्रेड कर रहे हैं।
ग्रिड की बाधाएं और जोखिम
रिकॉर्ड तिमाही के बावजूद, संरचनात्मक चुनौतियां बनी हुई हैं। पर्याप्त ग्रिड निकासी (evacuation) इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी तेजी से बढ़ रही नवीकरणीय क्षमता के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रही है, जिससे सौर ऊर्जा को कर्टेल (curtail) करना पड़ रहा है। राजस्थान जैसे राज्यों में ट्रांसमिशन की सीमाओं के कारण प्रतिदिन 1500-2000 MW तक बिजली का नुकसान हो सकता है। विश्लेषकों को उपकरण की देरी, पावर परचेज एग्रीमेंट (PPAs) का बढ़ता बैकलॉग और नियामक परिवर्तनों के बीच परियोजनाओं के समय पर निष्पादन को लेकर चिंताएं हैं। पॉलिसी टाइमिंग पर निर्भरता और घटती भविष्य की पाइपलाइन, वर्तमान गति को टिकाऊ बनाए रखने पर सवाल खड़े करती है।
भविष्य का दृष्टिकोण
भारत का नवीकरणीय ऊर्जा के प्रति कमिटमेंट मजबूत है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करना है। उद्योग की भविष्यवाणियों के अनुसार, भारत 2026 तक सालाना इंस्टॉलेशन के आधार पर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सौर बाजार बनने की राह पर है। हालांकि, भविष्य की वृद्धि ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों को दूर करने, लागत दबावों का प्रबंधन करने और क्षमता वृद्धि के साथ विनिर्माण पैमाने को संरेखित करने पर निर्भर करेगी, ताकि पॉलिसी-संचालित Q1 उछाल के बाद मंदी से बचा जा सके।