राष्ट्रीय लक्ष्यों पर ग्रहण?
भारत दुनिया की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा क्षमता (Solar Potential) वाले देशों में से एक है, लेकिन इसका इस्तेमाल सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं है। राष्ट्रीय औसत सौर क्षमता उपयोग दर (Utilization Rate) केवल 3.16% है। उत्तरी भारत में यह दर 3.8% और पश्चिमी भारत में 4% है, जबकि दक्षिण का प्रदर्शन 3.6% है। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर ( 0.6%) और पूर्वी ( 0.7%) क्षेत्रों में उपयोग दर बेहद चिंताजनक है।
राज्यों में कैसा है प्रदर्शन?
राज्यों के स्तर पर देखें तो दिल्ली (56.98%), हरियाणा (31.93%) और पंजाब (15.4%) अपने सौर पोटेंशियल का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। गुजरात इस साल 18.5 GW की स्थापित क्षमता के साथ पहले स्थान पर है, जिसने 7.6% क्षमता का उपयोग किया है। वहीं, राजस्थान के पास देश की सबसे बड़ी 828.8 GW की क्षमता है, लेकिन उसने अब तक केवल 3.41% का उपयोग किया है, जिसकी स्थापित क्षमता 28.3 GW है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और पुरानी समस्याएं
आंकड़ें बताते हैं कि जनवरी 2026 तक भारत की कुल स्थापित क्षमता लगभग 520 GW थी, जिसमें से 263 GW (लगभग 50.6%) नॉन-फॉसिल स्रोतों से आई है। अकेले सौर ऊर्जा का योगदान करीब 140 GW था। 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। इन आंकड़ों के बावजूद, ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। इसके चलते राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में उत्पन्न होने वाली बिजली को मांग वाले शहरों तक पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। इसी कमी के कारण मार्च से अगस्त 2025 के बीच राजस्थान में ही सौर और पवन ऊर्जा की लगभग 4 GW बिजली को काटना (Curtailment) पड़ा।
भविष्य की राह और चुनौतियां
सरकार 'पीएम सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना' जैसी पहलों से रूफटॉप सोलर (Rooftop Solar) को बढ़ावा दे रही है, जिसमें तेज़ी देखी जा रही है। लेकिन, ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) और प्रोजेक्ट के धीमे अप्रूवल जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। भविष्य को देखते हुए, भारत के सौर क्षेत्र में ग्रोथ की उम्मीद है। 2035-36 तक सौर ऊर्जा देश का प्रमुख ऊर्जा स्रोत बनने की ओर अग्रसर है। हालांकि, 2030 तक 500 GW के लक्ष्य को पाने के लिए ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी समस्याओं को तुरंत सुलझाना होगा।