यह ग्रोथ भारत के पिछले दशकों के प्रदर्शन से कहीं आगे है और ग्लोबल रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) के समीकरणों को बदल रही है। अनुमान है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) जैसे प्रमुख बाजार अपनी क्षमता वृद्धि में धीमी गति का सामना कर सकते हैं, जबकि भारत लगातार तेजी दिखा रहा है। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल (Non-Fossil Fuel) क्षमता हासिल करना है, जिसके लिए 2030 तक 280-300 GW सोलर एनर्जी जोड़ने का लक्ष्य है। ब्लूमबर्गएनईएफ (BloombergNEF) के अनुसार, भारत 2026 में 50 GW से थोड़ी अधिक नई सोलर क्षमता जोड़ने की उम्मीद कर रहा है, जो पिछले साल से 6% ज्यादा है। इसमें बड़े यूटिलिटी-स्केल प्रोजेक्ट्स (Utility-scale Projects) और सरकारी सब्सिडी प्रोग्राम्स (Subsidy Programs) का बड़ा योगदान होगा।
इस ज़बरदस्त विस्तार के पीछे कई अहम सरकारी पहलों का हाथ है। 'पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना' (PM Surya Ghar: Muft Bijli Yojana) और 'पीएम कुसुम 2.0' (PM KUSUM 2.0) जैसी योजनाओं से डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी (Distributed Renewable Energy - DRE) को बढ़ावा मिल रहा है। उम्मीद है कि 2030 तक भारत की कुल सोलर क्षमता में DRE का हिस्सा 20% से बढ़कर 35% हो जाएगा। कमर्शियल एंड इंडस्ट्रियल (Commercial & Industrial - C&I) सेक्टर एक बड़ा ग्रोथ इंजन है, जहाँ सालाना इंस्टॉलेशन करीब 10 GW तक पहुँच रहे हैं। 'ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस' (Green Energy Open Access) और 'वर्चुअल पावर परचेज एग्रीमेंट्स' (Virtual Power Purchase Agreements - VPPAs) जैसी नीतियों से इस सेगमेंट में मांग बढ़ रही है। 'नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन' (National Green Hydrogen Mission) भी नई मांग पैदा कर रहा है, और फ्लोटिंग सोलर (Floating Solar) नीतियां भी अपनाई जा रही हैं। एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) समाधानों में भी भारी तेजी देखी जा रही है, और अगले 18 महीनों में डबल-डिजिट एनर्जी स्टोरेज क्षमता बढ़ने का अनुमान है।
भारत की घरेलू सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) क्षमताएं भी प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (Production-Linked Incentive - PLI) योजनाओं, अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (Approved List of Models and Manufacturers - ALMM) और बेसिक कस्टम्स ड्यूटी (Basic Customs Duty - BCD) जैसे उपायों से काफी बढ़ी हैं। मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 2025 के अंत तक 125 GW को पार करने की उम्मीद है। हालांकि, इस तेज विस्तार से अपस्ट्रीम सप्लाई चेन (Upstream Supply Chain) में कमजोरियां भी सामने आई हैं। भारत अभी भी पॉलीसिलिकॉन (Polysilicon), इंगोट्स (Ingots) और वेफर्स (Wafers) जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, जबकि घरेलू पॉलीसिलिकॉन उत्पादन बहुत कम है। PLI स्कीम मॉड्यूल और सेल क्षमता बढ़ा रही है, पर अपस्ट्रीम क्षेत्रों में प्रगति धीमी है; पॉलीसिलिकॉन और वेफर क्षमताएं अपने लक्ष्यों का क्रमशः केवल 14% और 10% ही हासिल कर पाई हैं।
जहां भारत की सोलर ग्रोथ की कहानी मजबूत है, वहीं कुछ महत्वपूर्ण जोखिम और संरचनात्मक कमियां इसकी प्रगति को धीमा कर सकती हैं। पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों (DISCOMs) का वित्तीय स्वास्थ्य एक बड़ी चिंता का विषय है, जिनका संचित घाटा ₹7.08 ट्रिलियन तक पहुँच गया है। यह प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग (Project Financing) की लागत बढ़ाता है और निवेश को रोक सकता है। ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर (Transmission Infrastructure) रिन्यूएबल क्षमता वृद्धि के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया है, जिससे कई राज्यों में सोलर और विंड पावर का भारी करटेलमेंट (Curtailment) हो रहा है, जो डेवलपर्स के लिए बड़ा वित्तीय नुकसान है। घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाए जाने के बावजूद, इसके लागू होने में चुनौतियां हैं, और परिचालन क्षमता अक्सर प्रतिबद्धताओं से पीछे रहती है। अपस्ट्रीम सप्लाई चेन एक बड़ी बाधा बनी हुई है, जहां भारत पॉलीसिलिकॉन और वेफर्स के लिए आयात पर भारी निर्भर है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority) द्वारा BESS और सोलर प्रोजेक्ट्स के लिए नए तकनीकी मानक, विश्वसनीयता बढ़ाने के उद्देश्य से, अनुपालन आवश्यकताएं बढ़ा सकते हैं।
आगे देखते हुए, 2026 भारत के लिए इंटीग्रेटेड क्लीन एनर्जी (Integrated Clean Energy) ग्रोथ का साल साबित होने वाला है। सोलर और विंड के साथ-साथ, एनर्जी स्टोरेज (Energy Storage) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, जिसमें अगले 18 महीनों में डबल-डिजिट एनर्जी स्टोरेज क्षमता की उम्मीद है। भारत अपने 2030 के 500 GW क्लीन एनर्जी लक्ष्य को पूरा करने के लिए अगले पांच वर्षों में लगभग $350 बिलियन के निवेश को आकर्षित करने का लक्ष्य रखता है। C&I सोलर मार्केट 2026 तक लगभग 30-35 GW इंस्टॉलेशन के साथ एक मजबूत ग्रोथ पिलर बने रहने की उम्मीद है। विश्लेषकों को स्पष्ट नीतियों, अनुकूल ब्याज दरों और AI इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों से बढ़ती मांग के चलते रिन्यूएबल एनर्जी स्टॉक्स (Renewable Energy Stocks) में मजबूत मांग जारी रहने की उम्मीद है। 2030 के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए देश की समग्र रणनीति में ग्रिड आधुनिकीकरण, सप्लाई चेन लचीलापन और वित्तीय स्थिरता पर सावधानीपूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता होगी, ताकि तेजी से क्षमता वृद्धि विश्वसनीय और लागत प्रभावी बिजली प्रदान कर सके।