भारत में सोलर पैनल बनाने वाली इंडस्ट्री पर नई सरकारी नीतियों का भारी असर पड़ा है। जरूरी कंपोनेंट्स की किल्लत के चलते कई फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं, जिससे उत्पादन की लागत बढ़ गई है और 2030 तक क्लीन एनर्जी के लक्ष्यों को पूरा करने में देरी हो सकती है।
Detailed Coverage
सोलर इंडस्ट्री पर नई पॉलिसी का असर
भारत की सोलर पैनल मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री इस वक्त एक बड़ी मुश्किल से गुजर रही है। 1 जून से लागू हुई नई सरकारी नीतियों का मकसद डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ावा देना था, लेकिन इसके चलते अचानक से जरूरी कंपोनेंट्स, खासकर सोलर सेल्स की किल्लत हो गई है। घरेलू उत्पादन क्षमता फिलहाल इंडस्ट्री की मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं है, जिससे सप्लाई चेन में बड़ा गैप आ गया है।
फैक्ट्रियों पर ताले, उत्पादन पर ग्रहण
इंडस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक, देश के करीब एक-तिहाई छोटे और मध्यम आकार के सोलर पैनल निर्माताओं ने अस्थायी तौर पर अपना प्रोडक्शन रोक दिया है। ये कंपनियां देश की कुल पैनल उत्पादन क्षमता का लगभग 60% हिस्सा हैं। पहले जो कंपोनेंट्स इंपोर्ट (Import) किए जाते थे, उनके लिए अब डोमेस्टिक सप्लायर्स से इंतजार का समय 8 महीने तक पहुंच गया है। इस वजह से कुल फैक्ट्री आउटपुट में भारी गिरावट आई है। कुछ चालू यूनिट्स भी लिमिटेड स्टॉक के सहारे अपनी क्षमता के छोटे से हिस्से पर ही काम कर पा रही हैं।
प्रोडक्शन कॉस्ट में भारी बढ़ोतरी
स्थानीय सोलर सेल की अनुपलब्धता के कारण प्रोडक्शन कॉस्ट में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। जिन मैन्युफैक्चरर्स के पास खुद की सेल बनाने की क्षमता नहीं है, उनके लिए डोमेस्टिक कंपोनेंट्स का इस्तेमाल करना चीनी इंपोर्ट्स से बने पैनलों की तुलना में लगभग दोगुना महंगा साबित हो रहा है। उत्पादन लागत में आई इस भारी बढ़ोतरी से सेक्टर में लगे करीब $4 बिलियन के निवेश पर खतरा मंडरा रहा है।
प्रोजेक्ट्स होंगे महंगे, डेवलपमेंट पर असर
एनालिस्ट्स (Analysts) का मानना है कि बढ़ी हुई इनपुट कॉस्ट के चलते सोलर प्रोजेक्ट्स की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इंडस्ट्री के कुछ लीडर्स का अनुमान है कि प्रोजेक्ट कॉस्ट में 35% तक का इजाफा हो सकता है, जिससे देशभर में नए सोलर पावर प्लांट लगाने की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
लोकल प्रोडक्शन बढ़ाने की चुनौतियां
सरकार इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और उम्मीद कर रही है कि अगले 6 महीनों में डोमेस्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में सुधार होगा। हालांकि, आत्मनिर्भर बनने का रास्ता आसान नहीं है। हाई-टेक सोलर सेल फैक्ट्री लगाने के लिए बड़े पैमाने पर कैपिटल इन्वेस्टमेंट (Capital Investment) और लंबी अवधि की टेक्नोलॉजिकल पार्टनरशिप की जरूरत होती है। ऐसे में एक और बड़ी चुनौती सामने आ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने सोलर मैन्युफैक्चरिंग के जरूरी उपकरण और टेक्निकल सपोर्ट के एक्सपोर्ट (Export) को सख्त कर दिया है, जिससे भारतीय कंपनियों के लिए प्रोडक्शन गैप को जल्दी भरना और मुश्किल हो गया है।
2030 के एनर्जी टारगेट्स पर रिस्क
भारत ने 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। सोलर मॉड्यूल सप्लाई चेन में किसी भी तरह का लंबा व्यवधान इन टारगेट्स के लिए खतरा पैदा कर सकता है। अगर डेवलपर्स को बढ़ी हुई लागत और प्रोजेक्ट में देरी का सामना करना पड़ता है, तो ऐसे में देश की बढ़ती बिजली की मांग को पूरा करने के लिए कोयले जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर अस्थायी रूप से अधिक निर्भरता बढ़ सकती है। अगले 3 से 5 सालों में इंडस्ट्री की अपनी सेल प्रोडक्शन बढ़ाने की क्षमता ही यह तय करेगी कि क्या पॉलिसी-जनित सप्लाई के ये मुद्दे हल हो पाते हैं या नहीं।
