ग्रीन अमोनिया डील्स हुईं फाइनल, कीमतों में आई बड़ी गिरावट
खास बात ये है कि इस 10 साल के करार के तहत ग्रीन अमोनिया ₹49.75 से ₹64.74 प्रति किलोग्राम के बेहद कॉम्पिटिटिव रेट पर मिलेगा। ये दरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे €1,000 प्रति टन (जो करीब ₹110 प्रति किलोग्राम होता है) से काफी कम हैं। ये सब नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का हिस्सा है, जिसमें SIGHT प्रोग्राम के तहत ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन के लिए ₹13,050 करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है। इस डील से अगले एक दशक में इंपोर्टेड ग्रे अमोनिया की जगह ग्रीन अमोनिया का इस्तेमाल होगा, जिससे भारत के $2.5 बिलियन की बचत हो सकती है।
फर्टिलाइजर कंपनियां करेंगी ग्रीन अमोनिया का इस्तेमाल
इस ग्रीन अमोनिया को अपनाने की तैयारी कई बड़ी फर्टिलाइजर कंपनियों ने भी कर ली है। इनमें इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव (IFFCO), पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड (PPL), इंडिया पोटेश लिमिटेड (IPL) और कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड (CIL) शामिल हैं। कोरोमंडल इंटरनेशनल का P/E रेशियो 23.88 के आसपास है, जो फर्टिलाइजर इंडस्ट्री के औसत 10.46 से काफी ऊपर है। वहीं, पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड का P/E 11.35 से 13.44 के बीच है, जिसे कुछ जानकारों की नजर में ज्यादा बेहतर वैल्यूएशन माना जा रहा है। इन कंपनियों के लिए इस नए ग्रीन इनपुट को अपनाना और लागत प्रबंधन एक बड़ी चुनौती होगी।
डेवलपर्स के प्रोजेक्ट्स पर एग्जीक्यूशन का खतरा
डेवलपर्स की बात करें तो ACME ग्रुप को 10 साल के लिए 3.7 लाख टन प्रति वर्ष की बड़ी क्षमता मिली है, जिसका कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू करीब ₹20,000 करोड़ है। ACME ओमान के डुक्म में भी ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। वहीं, ओडिशा में 0.4 मिलियन टन सालाना क्षमता वाला प्रोजेक्ट जापान जैसे देशों को एक्सपोर्ट के लिए है। हालांकि, भारत की कुल अमोनिया डिमांड 25.5 मिलियन टन प्रति वर्ष के मुकाबले अभी मिली 7.24 लाख टन की क्षमता काफी कम है, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन की जरूरत साफ दिखती है। ऐसे में, इन बड़े प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन में देरी और फाइनेंसिंग एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
सब्सिडी खत्म होने पर कीमतें बढ़ने की चिंता
इस डील में सबसे बड़ी चिंताएं लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी और प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन को लेकर हैं। SIGHT प्रोग्राम के तहत मिलने वाली सरकारी सब्सिडी पहले तीन साल के लिए ही है। इसके बाद डेवलपर्स को लागत को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना होगा। साथ ही, बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना, सप्लाई चेन मैनेज करना और लगातार ग्रीन पावर की सप्लाई सुनिश्चित करना जैसी कई चुनौतियां हैं। फर्टिलाइजर कंपनियों के लिए यह भी देखना होगा कि क्या ग्रीन अमोनिया की लागत पारंपरिक ग्रे अमोनिया के मुकाबले लंबे समय तक फायदेमंद रहेगी।
आगे का रास्ता
कुल मिलाकर, भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम है। भविष्य में इस सेक्टर की सफलता सरकार की नीतियों, डेवलपर्स के प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन और मार्केट में ग्रीन अमोनिया की स्वीकार्यता पर निर्भर करेगी। ग्लोबल लेवल पर ग्रीन अमोनिया की कीमतें भी लगातार गिर रही हैं, जिससे उम्मीद है कि 2025 के अंत तक यह और भी किफायती हो जाएगा।