इंडियन सोलर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के मुताबिक, PM-KUSUM स्कीम से सोलर मॉड्यूल की मांग **116 GW** तक पहुंच सकती है। हालांकि, डोमेस्टिक कंपनियों के लिए यह ग्रोथ का रास्ता है, लेकिन इंडस्ट्री में मौजूदा ओवरकैपेसिटी और इम्पोर्टेड रॉ-मटीरियल पर निर्भरता निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकती है।
भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां सरकार डीजल और ग्रिड-आधारित सिंचाई सिस्टम को सोलर पावर से बदलने पर जोर दे रही है। इस बदलाव से डोमेस्टिक सोलर इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियों के लिए 116 GW का नया बाजार खुलने की उम्मीद है। इस योजना का मुख्य मकसद किसानों पर पड़ने वाले बिजली सब्सिडी के बोझ को कम करना है।
PM-KUSUM का दम
इस एनर्जी ट्रांजिशन की मुख्य धुरी 'प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान' (PM-KUSUM) है। जुलाई 2026 तक 28 लाख से ज्यादा पंपों का सोलराइजेशन किया जा चुका है और अक्टूबर 2026 तक 13.8 GW की कैपेसिटी ऐड हुई है। सरकार के डोमेस्टिक कंटेंट रिक्वायरमेंट्स के नियमों के कारण इसका सीधा फायदा स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स को मिल रहा है।
इकोनॉमिक्स और सब्सिडी का बोझ
यह बदलाव राजकोषीय जरूरत (Fiscal Necessity) बन चुका है। एग्रीकल्चर पावर सब्सिडी का बोझ फाइनेंशियल ईयर 2025 में ₹2.41 लाख करोड़ तक पहुंच गया है, जो कि फाइनेंशियल ईयर 2020 में महज ₹1.21 लाख करोड़ था।
मैन्युफैक्चरिंग हकीकत और रिस्क
हालांकि 116 GW का आंकड़ा काफी बड़ा दिखता है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सतर्क रहने की जरूरत है:
- ओवरकैपेसिटी: भारत में सोलर मैन्युफैक्चरिंग की कुल क्षमता 233 GW है, जो डिमांड से कहीं ज्यादा है। इस वजह से यूटिलाइजेशन रेट सिर्फ 35% से 40% के बीच है, जो प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डालता है।
- अपस्ट्रीम गैप: हम अभी सिर्फ मॉड्यूल असेंबल करने पर निर्भर हैं। सोलर सेल, सिलिकॉन वेफर्स और पॉलिसिलिकॉन के लिए हमें अभी भी इम्पोर्ट पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन का रिस्क बना हुआ है।
निवेशकों को उन कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जो मॉड्यूल असेंबली से आगे बढ़कर खुद की सेल और वेफर मैन्युफैक्चरिंग यानी वर्टिकल इंटीग्रेशन की ओर बढ़ रही हैं।
