भारत में रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती कैपेसिटी के बीच सोलर प्रोड्यूसर्स को स्टोरेज की कमी से **15-20%** बिजली गंवानी पड़ रही है। इस समस्या के समाधान के रूप में 'Iron-Air' टेक्नोलॉजी पर काम शुरू हो गया है, जो लिथियम-आयन का एक सस्ता विकल्प हो सकती है, लेकिन फिलहाल यह शुरुआती चरण में है।
सोलर पावर का बड़ा संकट
भारत तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में विस्तार कर रहा है, लेकिन स्टोरेज कैपेसिटी की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। देश में सोलर प्रोड्यूसर्स को अपनी पैदा की गई बिजली का 15-20% हिस्सा इसलिए बर्बाद करना पड़ रहा है क्योंकि ग्रिड इसे स्टोर करने में असमर्थ है। कुछ मामलों में तो यह बर्बादी 65% तक पहुंच गई है।
कैसे काम करेगी यह टेक्नोलॉजी?
इस कमी को पूरा करने के लिए 'Iron-Air' सिस्टम पर काम किया जा रहा है। Meine Electric जैसी कंपनियां एक ऐसा सिस्टम बना रही हैं, जो 6 से 8 घंटे चार्ज होकर 18 घंटे तक बिजली डिस्चार्ज कर सकता है। इसकी केमिस्ट्री सिंपल है—लोहा, ऑक्सीजन और पानी के साथ रिएक्ट करके बिजली बनाता है। चूंकि भारत में आयरन ओर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, इसलिए यह लिथियम-आयन के मुकाबले सप्लाई चेन के मामले में बड़ा फायदेमंद हो सकता है।
कॉस्ट बनाम एफिशिएंसी का गणित
निवेशकों को इसके फायदे और नुकसान दोनों समझने होंगे। इसकी अनुमानित स्टोरेज कॉस्ट लगभग ₹5 प्रति kWh है। हालांकि, इसकी एफिशिएंसी लिथियम-आयन के मुकाबले कम है, जो लगभग 23-50% के बीच रहती है। यानी, भले ही इसे बनाना सस्ता हो, लेकिन आउटपुट के मामले में यह फिलहाल पिछड़ रही है।
क्या अभी निवेश का सही समय है?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह टेक्नोलॉजी अभी वैलीडेशन के फेज में है। इसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए भरोसेमंद साबित होने में कम से कम 5 साल का लंबा टेस्टिंग समय लग सकता है। फिलहाल, निवेशकों को इसे किसी मुनाफे की उम्मीद के बजाय लॉन्ग-टर्म रिसर्च और डेवलपमेंट थीम के तौर पर ही देखना चाहिए।
