इथेनॉल सरप्लस की मार
भारत इथेनॉल के भारी सरप्लस (अतिरिक्त मात्रा) से जूझ रहा है। तेल कंपनियां जहां 11 अरब लीटर इथेनॉल खरीद पाई हैं, वहीं डिस्टिलरीज के पास 20 अरब लीटर से ज्यादा अतिरिक्त इथेनॉल जमा हो गया है। ऐसे में, ये फैक्ट्रियां अपनी क्षमता से काफी कम चल रही हैं, जो देश के बायोएनर्जी सेक्टर के लिए एक बड़ा वित्तीय संकट पैदा कर रहा है।
नए इस्तेमाल की तलाश
इस बढ़ते सरप्लस से निपटने के लिए, ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) और इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) जैसे इंडस्ट्री ग्रुप्स इथेनॉल के नए और अभिनव इस्तेमाल तलाश रहे हैं। पायलट प्रोजेक्ट्स के तहत इथेनॉल से चलने वाले कुकिंग स्टोव को एक क्लीनर होम फ्यूल के तौर पर परखा जा रहा है, खासकर ग्रामीण इलाकों के लिए। इसके अलावा, बैकअप जेनरेटर के लिए डीजल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग (मिश्रण) को लेकर भी चर्चाएं जारी हैं। कर्नाटक जैसे राज्य इथेनॉल ब्लेंड वाले डीजल बसों के ट्रायल चलाकर उनकी व्यवहार्यता जांच रहे हैं।
फ्लेक्स-फ्यूल कारें: उम्मीदें और बाधाएं
इथेनॉल सरप्लस को खत्म करने का सबसे बड़ा जरिया फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स (FFVs) हैं। ये गाड़ियां पेट्रोल और इथेनॉल के अलग-अलग मिश्रण पर चल सकती हैं। Maruti Suzuki, Toyota और Bajaj Auto जैसी प्रमुख कार और बाइक निर्माता कंपनियों ने FFVs के प्रोटोटाइप (प्रारंभिक मॉडल) भी तैयार कर लिए हैं। लेकिन, इन कारों के लिए एक बड़ा वित्तीय हर्डल (बाधा) है। जहां इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) पर 5% GST लगता है, वहीं FFVs पर 18% से 40% तक GST वसूला जा रहा है, जिससे ये काफी महंगी हो जाती हैं। इसके अलावा, इथेनॉल फ्यूल की सहज उपलब्धता न होना भी एक बड़ी समस्या है।
कीमतों का खेल और इंडस्ट्री की मांग
FFVs की डिमांड और इथेनॉल की खपत बढ़ाने में सबसे बड़ी रुकावट घरेलू इथेनॉल की कीमतों को लेकर सरकार और इंडस्ट्री के बीच चल रहा गतिरोध है। इंडस्ट्री प्लेयर्स चाहते हैं कि सरकार टैक्स में कटौती करे और एक स्पष्ट मूल्य निर्धारण नीति लाए, ताकि इथेनॉल ब्लेंड्स आम आदमी के लिए किफायती हो सकें। हालांकि, सरकार घरेलू इथेनॉल की तय कीमतों को कम करने में हिचकिचा रही है। इसका सीधा मतलब है कि घरेलू इथेनॉल, आयातित इथेनॉल की तुलना में महंगा पड़ता है और आम उपभोक्ता के लिए रेगुलर पेट्रोल से कम कॉम्पिटिटिव (प्रतिस्पर्धी) है। ब्राजील जैसे देश, जहां FFVs आम हैं और 100% इथेनॉल (E100) तक का इस्तेमाल होता है, इसके विपरीत भारत में यह स्थिति नहीं है।
भविष्य के खतरे
इथेनॉल की यह अधिकता और नए इस्तेमाल खोजने में धीमी प्रगति कई जोखिम पैदा करती है। अगर सरकार ने इथेनॉल की कीमतों को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया, तो सरप्लस बना रहेगा और फैक्ट्रियां खाली पड़ी रहेंगी। FFVs पर हाई टैक्सेस ग्राहकों को खरीदने से रोकेंगे, जिससे इथेनॉल फ्यूलिंग स्टेशन्स की कमी और बढ़ेगी। गन्ने जैसी फसलों पर निर्भरता के कारण इथेनॉल की लागत और सप्लाई में मौसम व बाजार की वजह से उतार-चढ़ाव का खतरा भी बना रहता है।
इंडस्ट्री की अपील
इंडस्ट्री ग्रुप्स सरकार से E20 लक्ष्य से आगे बढ़कर E25 और E30 जैसे ऊंचे ब्लेंडिंग टारगेट तय करने की मांग कर रहे हैं। वे FFVs पर GST कम करने और EVs की तरह ग्राहकों को इंसेंटिव (प्रोत्साहन) देने की भी अपील कर रहे हैं। फिलहाल इन मुद्दों पर चर्चाएं जारी हैं, लेकिन एक स्पष्ट पॉलिसी डायरेक्शन (नीतिगत दिशा) की तत्काल आवश्यकता है।