IIT गुवाहाटी का कमाल! कार्बन कैप्चर और बायोफ्यूल बनाने का नया तरीका ईजाद

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
IIT गुवाहाटी का कमाल! कार्बन कैप्चर और बायोफ्यूल बनाने का नया तरीका ईजाद

IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक खास दो-चरणीय कल्टीवेशन (cultivation) प्रक्रिया विकसित की है। इससे कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) कैप्चर करने की क्षमता और माइक्रोएल्गल बायोमास (microalgal biomass) का उत्पादन **25%** से ज़्यादा बढ़ गया है। यह इनोवेशन, रिन्यूएबल (renewable) बायोडीजल बनाने की लागत कम करने का लक्ष्य रखता है और इंडस्ट्रियल कार्बन एमिशंस (industrial carbon emissions) को इस्तेमाल करने का एक रास्ता भी खोल सकता है, हालांकि यह तकनीक अभी रिसर्च फेज में है।

कार्बन कैप्चर और बायोफ्यूल में नई क्रांति!

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने बायोएनर्जी (bioenergy) के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल की है। उन्होंने माइक्रोएल्गी (microalgae) के लिए एक नई दो-चरणीय कल्टीवेशन (cultivation) विधि का आविष्कार किया है। इस विधि का मुख्य उद्देश्य कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) कैप्चर करने की क्षमता को बढ़ाना है, साथ ही माइक्रोएल्गल बायोमास (microalgal biomass) का उत्पादन भी बढ़ाना है, जिससे रिन्यूएबल फ्यूल (renewable fuel) जैसे बायोडीजल (biodiesel) बनाया जा सके।

क्या थी चुनौती और कैसे हुआ समाधान?

माइक्रोएल्गी का इस्तेमाल कार्बन कैप्चर के लिए करना एक बड़ी चुनौती रही है, क्योंकि इसमें एल्गी की ग्रोथ (growth) और CO2 के उच्च स्तर के बीच संतुलन बनाना मुश्किल होता है। CO2 की ज़्यादा मात्रा शुरुआत में ग्रोथ बढ़ा सकती है, लेकिन समय के साथ यह एसिडिफिकेशन (acidification) और पोषक तत्वों की कमी का कारण बनती है, जिससे एल्गी का विकास धीमा हो जाता है। इस समस्या को हल करने के लिए, प्रोफेसर कौस्तुभ मोहंती (Professor Kaustubha Mohanty) और उनके शोध छात्र दीपेश सिंह चौहान (Deepesh Singh Chauhan) के नेतृत्व वाली IIT गुवाहाटी की टीम ने एक दो-चरणीय रणनीति अपनाई।

पहले चरण में, टीम ने एल्गी की तेजी से शुरुआती ग्रोथ के लिए 15% CO2 कंसंट्रेशन (concentration) में कल्चर (culture) किया। दूसरे चरण में, CO2 कंसंट्रेशन को घटाकर 5% कर दिया गया और विशेष पोषक तत्व—कैल्शियम (calcium) और फास्फोरस (phosphorus)—मिलाए गए। इस बदलाव से पीएच (pH) स्तर स्थिर हुआ और फोटोसिंथेसिस (photosynthesis) जारी रहा। 'रिन्यूएबल एनर्जी' (Renewable Energy) जर्नल में प्रकाशित नतीजों के अनुसार, इस विधि से बायोमास उत्पादन में 25.7% की वृद्धि हुई, CO2 फिक्सेशन (fixation) में 35.4% का इजाफा हुआ, और लिपिड प्रोडक्टिविटी (lipid productivity) सामान्य तरीकों की तुलना में 1.86 गुना अधिक पाई गई।

लागत में कमी और भविष्य की संभावनाएं

बायोएनर्जी सेक्टर में एक बड़ी बाधा माइक्रोएल्गल बायोमास को ग्रोथ मीडियम (growth medium) से अलग करने और हार्वेस्ट (harvest) करने में लगने वाली भारी ऊर्जा लागत है। IIT गुवाहाटी की यह प्रक्रिया कैल्शियम का उपयोग करके माइक्रोएल्गल सेल्स (microalgal cells) के सेल्फ-फ्लोक्युलेशन (self-flocculation) को बढ़ावा देती है। इससे सेल्स आपस में जुड़कर कॉम्पैक्ट फ्लॉक्स (compact flocks) बना लेते हैं, जिससे बायोमास रिकवरी (biomass recovery) की दक्षता 98.46% तक पहुंच जाती है। हार्वेस्टिंग ऊर्जा में यह कमी माइक्रोएल्गल बायो-रिफाइनरी (biorefineries) को आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

निवेशकों और इंडस्ट्री पर नजर रखने वालों के लिए, इस शोध का महत्व डीकार्बोनाइजेशन (decarbonization) और रिन्यूएबल एनर्जी (renewable energy) की व्यापक मांग में निहित है। जो इंडस्ट्रीज अपने कार्बन फुटप्रिंट (carbon footprint) को कम करना चाहती हैं, वे कार्बन कैप्चर और यूटिलाइजेशन (utilization) तकनीकों पर तेजी से ध्यान केंद्रित कर रही हैं। इंडस्ट्रियल फ्लू गैस (industrial flue gas) को माइक्रोएल्गी कल्टीवेशन (cultivation) के लिए CO2 के निरंतर स्रोत के रूप में उपयोग करने की क्षमता के साथ, यह तकनीक वेस्ट गैस (waste gas) को उपयोगी बायोएनर्जी उत्पादों में बदलने का लक्ष्य रखती है।

हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह एक अकादमिक (academic) सफलता है। प्रयोगशाला स्तर पर परिणाम सकारात्मक होने के बावजूद, ऐसी तकनीकों को औद्योगिक स्तर पर लागू करने में महत्वपूर्ण चुनौतियां शामिल हैं। इनमें बड़े पैमाने पर फोटोबायोरिएक्टर्स (photobioreactors) के लिए आवश्यक उच्च पूंजीगत व्यय (capital expenditure), अनियंत्रित वातावरण में लगातार उपज बनाए रखने की क्षमता, और जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) तथा अन्य रिन्यूएबल विकल्पों की तुलना में बायो-आधारित ईंधन (bio-based fuels) की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता (competitiveness) शामिल है। इस तकनीक के लिए मुख्य निगरानी भविष्य की पायलट परियोजनाओं (pilot projects) पर होगी, जो नियंत्रित प्रयोगशाला सेटिंग के बाहर इन दक्षता लाभों को दोहराने का प्रयास करेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.