केंद्र सरकार ने PM-KUSUM 2.0 स्कीम में **10 GW** की एग्रीवोल्टिक्स क्षमता जोड़ने का एलान किया है। इसके तहत किसान एक ही जमीन पर खेती और सोलर पावर जनरेशन दोनों कर सकेंगे, हालांकि इसके लिए शुरुआती निवेश और रेगुलेटरी चुनौतियों पर नजर रखना जरूरी है।
भारत सरकार का नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) अब PM-KUSUM स्कीम के अगले चरण में 10 GW की एग्रीवोल्टिक्स क्षमता को शामिल करने की तैयारी कर रहा है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य जमीन के उपयोग को बेहतर बनाना है, ताकि किसान एक ही साथ फसल उगा सकें और बिजली का उत्पादन भी कर सकें। ऊंचे सोलर पैनल लगाकर सरकार किसानों के लिए कमाई के तीन जरिए खोलना चाहती है: फसल की बिक्री, डिस्कॉम को अतिरिक्त बिजली बेचना और डीजल पर निर्भरता कम करके सिंचाई की लागत में बचत।
बिज़नेस और ऑपरेशनल चुनौतियां
एग्रीवोल्टिक्स मॉडल पारंपरिक ग्राउंड-माउंटेड सोलर प्रोजेक्ट्स से काफी अलग है। इसमें ऊंचे स्ट्रक्चर्स बनाने के लिए ज्यादा कैपिटल खर्च (Capex) की जरूरत पड़ती है, क्योंकि पैनलों को इस तरह सेट करना होता है कि नीचे आसानी से खेती और मशीनरी का काम हो सके। सोलर इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन में शामिल कंपनियों के लिए इन बढ़ती लागतों का आकलन करना प्रोजेक्ट की वायबिलिटी के लिए बेहद जरूरी है।
टेक्निकल और रेगुलेटरी रिस्क
पुणे में रिसर्चर अलग-अलग फसलों पर सोलर पैनल की टेस्टिंग कर रहे हैं ताकि धूप और छाया का सही तालमेल बिठाया जा सके। हालांकि, निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि राज्यों के स्तर पर जमीन के वर्गीकरण और रेगुलेटरी गाइडलाइंस में अस्पष्टता प्रोजेक्ट्स में देरी का कारण बन सकती है। इसके अलावा, FPOs और को-ऑपरेटिव्स के लिए फाइनेंस जुटाना भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि बैंक लंबे समय तक क्रेडिट गारंटी के बिना निवेश करने से बच सकते हैं।
मुनाफे का गणित
इन प्रोजेक्ट्स की सफलता पूरी तरह स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशंस (SERCs) की पॉलिसी पर निर्भर करेगी। किसानों को बिजली के बदले क्या दाम मिलते हैं (Tariff Mechanism) और पावर परचेज एग्रीमेंट्स (PPA) का स्ट्रक्चर कैसा होगा, ये आने वाले समय में निवेशकों के लिए सबसे अहम मॉनिटरेबल्स होंगे।
