US की Caelux Corporation ने भारत की तीन बड़ी सौर ऊर्जा कंपनियों - GREW Solar, Rayzon Solar और Navitas Solar के साथ हाथ मिलाया है। इस साझेदारी के तहत **5 GW** की पेरोव्स्काइट-कोटेड ग्लास तकनीक को तैनात किया जाएगा, जिससे सोलर पैनल की एफिशिएंसी **29%** तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है।
तकनीक से बदलेगी उत्पादन की तस्वीर
इस साझेदारी की मुख्य कड़ी Caelux की प्रोप्राइटरी पेरोव्स्काइट थिन-फिल्म तकनीक है। सामान्य तौर पर सोलर सेल बनाने की प्रक्रिया में बड़े बदलाव की जरूरत होती है, लेकिन यह तकनीक मॉड्यूल कवर ग्लास पर ही पेरोव्स्काइट की एक पतली परत चढ़ा देती है। इससे मैन्युफैक्चरर्स को अपनी मौजूदा फैक्ट्रियों में भारी बदलाव किए बिना एनर्जी डेंसिटी बढ़ाने में मदद मिलेगी। उदाहरण के तौर पर, एक 10 GW की TOPCon प्रोडक्शन लाइन इस ग्लास के इस्तेमाल से अपनी क्षमता को बढ़ाकर 12 GW कर सकती है।
फिलहाल इंडस्ट्री में सोलर मॉड्यूल की एफिशिएंसी लगभग 23% के आसपास रहती है। कंपनियों का दावा है कि इस तकनीक से वे इसे 29% तक ले जाने में कामयाब होंगी। यह कदम भारतीय सोलर मॉड्यूल को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उठाया गया है।
चुनौतियां और भविष्य की राह
हालांकि, पेरोव्स्काइट तकनीक को अपनाना पूरी तरह आसान नहीं है। बड़े स्तर पर कोटिंग की एकसमान गुणवत्ता बनाए रखना और बाहरी वातावरण (धूप, बारिश, नमी) में मॉड्यूल की ड्यूरेबिलिटी सुनिश्चित करना बड़ी इंजीनियरिंग चुनौतियां हैं। Caelux ने बताया है कि साल 2025 में हुई शुरुआती कमर्शियल शिपमेंट की सफलता के बाद वे इन जोखिमों को कम करने पर काम कर रहे हैं।
इस पूरे प्रोजेक्ट के तहत 2028 तक कमर्शियल प्रोडक्शन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। दुनिया भर में हाइब्रिड-टैंडम तकनीक की क्षमता बढ़कर 19 GW तक पहुंच चुकी है, और इस साझेदारी के साथ भारतीय कंपनियां ग्लोबल टेक्नोलॉजी शिफ्ट के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही हैं। निवेशकों की नजरें अब इस बात पर टिकी होंगी कि कंपनियां उत्पादन को कितनी कुशलता से स्केल कर पाती हैं और असल परिस्थितियों में ये मॉड्यूल कैसा प्रदर्शन करते हैं।
