बांस की सप्लाई: एक बड़ी चुनौती
Assam Bio Ethanol Private Limited (ABEPL) का यह ₹4,930 करोड़ का ज्वाइंट वेंचर, जो दुनिया का अकेला बांस (Bamboo) पर आधारित सेकंड-जेनरेशन (2G) बायोइथेनॉल प्लांट है, अब अपनी पूरी क्षमता के साथ उत्पादन शुरू करने के लिए तैयार है। ट्रायल के दौरान प्लांट ने 99.7% शुद्धता वाला फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल बनाया है। प्लांट की सालाना 49,000 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) की क्षमता तक पहुंचने के लिए, ABEPL को हर साल करीब 5 लाख MTPA हरे बांस की जरूरत होगी। इसके लिए अगले 3 सालों में लगभग 12,500 हेक्टेयर ज़मीन पर बांस की खेती करनी होगी और 60 लाख पौधे लगाने होंगे। अभी 300 हेक्टेयर में 4,200 किसानों ने बांस की खेती शुरू कर दी है। कंपनी असम के 16 जिलों में 24 चिपिंग यूनिट लगा रही है, जिनमें से 8 पहले से काम कर रही हैं और बांस की चिप्स सप्लाई कर रही हैं। इथेनॉल के अलावा, यह प्लांट हर साल 19,000 टन फरफ्यूरल (furfural), 11,000 टन एसिटिक एसिड (acetic acid), 32,000 टन लिक्विड CO2 और 25 MW ग्रीन पावर भी बनाएगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई जान
ABEPL का पूरा बिजनेस मॉडल ही पूर्वोत्तर के ग्रामीण इलाकों की आर्थिक तरक्की से जुड़ा है। कंपनी सीधे किसानों से बांस खरीद रही है और अब तक बिना किसी बिचौलिए के ₹2.4 करोड़ का भुगतान कर चुकी है। इस सीधी खरीद से 30,000 से ज़्यादा किसान परिवारों को फायदा होने की उम्मीद है और यह योजना अगले 3 सालों में क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में ₹200 करोड़ लाने का अनुमान है। यह भारत सरकार की 'एक्ट ईस्ट' (Act East) पॉलिसी और पूर्वोत्तर के विकास एजेंडे के अनुरूप है। कंपनी गैर-फसली और बंजर ज़मीन का इस्तेमाल बांस की खेती के लिए कर रही है, ताकि कृषि भूमि का इस्तेमाल न हो। चाय बागानों जैसी संस्थाओं को भी पौधे बांटे जा रहे हैं, जो बांस की खेती में संभावनाएं तलाश रहे हैं।
सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स की बड़ी चुनौतियाँ
इतनी बड़ी मात्रा में कच्चे माल की ज़रूरत लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के लिए एक बड़ी चुनौती है। 300-km के दायरे और कई राज्यों में फैले 30,000 से ज़्यादा किसानों को जोड़ना और मैनेज करना एक मुश्किल काम है। लगातार अच्छी क्वालिटी के बांस की सप्लाई सुनिश्चित करना, उसकी खरीद और चिपिंग यूनिट तक पहुंचाना, और फिर प्लांट तक उसकी ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था करना, सब कुछ बहुत बारीकी से प्लान करना होगा। लगी हुई 8 चिपिंग यूनिट्स के अलावा बाकी यूनिट्स को समय पर चालू करना भी सप्लाई चेन के लिए अहम होगा।
बांस का अनूठा फायद और जोखिम
ABEPL का बांस पर निर्भर होना इसे गन्ने या मक्के जैसी फसलों पर आधारित फर्स्ट-जेनरेशन (1G) इथेनॉल प्लांट्स से अलग बनाता है, और यह 'फूड वर्सेज फ्यूल' (food vs fuel) की बहस से भी बचाता है। भारत सरकार भी 2G इथेनॉल उत्पादन पर ज़ोर दे रही है, जिसका लक्ष्य 2025 तक 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग हासिल करना है। प्लांट को 'ज़ीरो-वेस्ट' (zero-waste) फिलॉसफी के साथ डिजाइन किया गया है, जिसमें बांस के हर हिस्से का इस्तेमाल होगा। 12,500 हेक्टेयर से बांस की सोर्सिंग के साथ कार्बन न्यूट्रैलिटी (carbon neutrality) हासिल करना एक बड़ा लक्ष्य है। हालांकि, इतनी बड़ी मात्रा में बांस की खेती, भले ही गैर-कृषि भूमि पर हो, पानी और मज़दूरों जैसे संसाधनों पर दबाव डाल सकती है, खासकर पूर्वोत्तर जैसे संवेदनशील इलाकों में।
प्रमोटर की ताकत और एग्जीक्यूशन का रिस्क
ABEPL के प्रमोटर्स में Numaligarh Refinery Limited (NRL) जैसी स्थापित PSU, और फिनलैंड की Fortum और Chempolis Oy जैसी कंपनियां शामिल हैं, जिनके पास रिन्यूएबल एनर्जी और बायो-रिफाइनिंग का खास तकनीकी ज्ञान है। लेकिन, इतने बड़े और नए प्रोजेक्ट्स में एग्जीक्यूशन (execution) का अपना रिस्क होता है। भले ही प्लांट ने स्टेबिलाइजेशन फेज पार कर लिया हो, लेकिन किसी भी अप्रत्याशित तकनीकी समस्या, सोर्सिंग नेटवर्क डेवलपमेंट में लागत बढ़ने या क्षमता हासिल करने में देरी से फाइनेंशियल अनुमान प्रभावित हो सकते हैं।
भविष्य की राह और रणनीतिक स्थिति
ABEPL का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट भारत के रिन्यूएबल एनर्जी पोर्टफोलियो को बढ़ाने और पूर्वोत्तर में आर्थिक विकास को गति देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसकी सफलता इसी तरह के अन्य बायो-रिफाइनिंग प्रोजेक्ट्स के लिए एक मॉडल बन सकती है, जो क्षेत्रीय बायोमास संसाधनों का इस्तेमाल करें। एक भरपूर, गैर-खाद्य (non-food) फीडस्टॉक को फ्यूल-ग्रेड इथेनॉल और अन्य उपयोगी केमिकल्स में बदलकर, ABEPL ऊर्जा आत्मनिर्भरता, आयात पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण स्थिरता के भारत के लक्ष्यों के अनुरूप काम कर रहा है। प्लांट के ऑपरेशनल रैंप-अप और किसान एंगेजमेंट की रणनीति इसके आर्थिक और पर्यावरणीय उद्देश्यों को हासिल करने की क्षमता को दर्शाएगी।
