देशभर के करीब **27.6 लाख** परिवार स्टॉल्ड रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में फंसे हैं, जहां **₹12.44 लाख करोड़** की पूंजी दांव पर लगी है। RERA एक्ट की धारा 18 के तहत होमबॉयर्स के पास रिफंड पाने का कानूनी अधिकार है, लेकिन कागजी आदेश के बाद भी पैसा वापस पाना एक बड़ी चुनौती है।
भारत में अटके हुए रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स आम आदमी के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। सितंबर 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 27.6 लाख परिवार अपनी मेहनत की कमाई को लेकर परेशान हैं, और कुल ₹12.44 लाख करोड़ का निवेश इस समय फंसा हुआ है। राहत के लिए होमबॉयर्स के पास RERA, 2016 ही सबसे मजबूत जरिया है।
रिफंड पाने का कानूनी अधिकार (Section 18)
RERA की धारा 18 के मुताबिक, अगर बिल्डर एग्रीमेंट में तय समय सीमा के भीतर फ्लैट का पजेशन नहीं दे पाता है, तो खरीदार प्रोजेक्ट से बाहर निकलने का विकल्प चुन सकता है। इस स्थिति में बिल्डर को जमा की गई पूरी रकम, ब्याज के साथ वापस करनी होगी। तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में RERA अथॉरिटीज ने रिफंड के साथ 10.7% से 10.8% तक का सालाना ब्याज देने का आदेश भी दिया है।
रिकवरी में कहां आ रही है रुकावट?
कानूनी आदेश मिलना एक बात है, लेकिन उसे लागू करवाना दूसरी। अक्सर बिल्डर्स के पास लिक्विड कैश की कमी होती है या फंड्स का गलत इस्तेमाल हो चुका होता है। ऐसे में रिकवरी ऑर्डर के बावजूद पैसा वापस मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है। अथॉरिटी द्वारा बिल्डर की संपत्ति को अटैच करने की प्रक्रिया काफी धीमी और जटिल है।
होमबॉयर्स के लिए जरूरी सावधानी
शिकायत दर्ज करने से पहले यह ध्यान रखें कि आप अनजाने में अपने अधिकारों को न छोड़ें। कई बार बिल्डर्स 'रिवाइज्ड पजेशन डेट' का हवाला देकर नए एग्रीमेंट्स साइन करवाते हैं। इन दस्तावेजों में कुछ ऐसी शर्तें हो सकती हैं, जो भविष्य में रिफंड क्लेम करने के आपके अधिकार को खत्म कर सकती हैं। किसी भी कागज पर हस्ताक्षर करने से पहले कानूनी सलाह जरूर लें।
IBC का रास्ता
अगर प्रोजेक्ट आर्थिक रूप से डूबने की कगार पर है, तो RERA के अलावा आप 'इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' (IBC) के तहत भी जा सकते हैं। यहां होमबॉयर्स को 'फाइनेंशियल क्रेडिटर्स' का दर्जा मिलता है, जिससे वे कंपनी के लिक्विडेशन या समाधान प्रक्रिया में अपनी बात रख सकते हैं। इसके लिए सेल एग्रीमेंट और भुगतान की रसीदों के साथ पूरा रिकॉर्ड रखना बेहद जरूरी है।
