उत्तर प्रदेश सरकार ने लॉन्ग-टर्म प्रॉपर्टी लीज के लिए स्टैम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस में भारी कमी की है। अब **10 साल** के कॉन्ट्रैक्ट के लिए खर्च **₹20 लाख** से घटकर मात्र **₹26,000** रह गया है, जिससे नोएडा और लखनऊ जैसे शहरों में रेंटल मार्केट के औपचारिक होने की उम्मीद है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रॉपर्टी लीजिंग के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए लंबे समय के रेंटल एग्रीमेंट को रजिस्टर कराने की लागत को बहुत कम कर दिया है। इस फैसले का मकसद मकान मालिकों और किरायेदारों को अनौपचारिक और बिना रजिस्टर्ड एग्रीमेंट से निकालकर कानूनी रूप से मान्य कॉन्ट्रैक्ट की ओर ले जाना है। इस बदलाव का सीधा असर नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ जैसे बड़े शहरी केंद्रों पर देखने को मिलेगा।
क्या है लागत में बड़ा अंतर?
लंबे समय के एग्रीमेंट के लिए यह कमी काफी प्रभावी है। उदाहरण के लिए, पहले 10 साल के लीज एग्रीमेंट के लिए, जिसका सालाना किराया ₹6 लाख से ₹10 लाख के बीच हो, उस पर अपफ्रंट फीस ₹20 लाख तक चुकानी पड़ती थी। अब नए नियमों के तहत, स्टैम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन का कुल खर्च घटकर केवल ₹26,000 हो गया है। यह कदम कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टर के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा।
कानूनी सुरक्षा और पारदर्शिता
यह पहल 'उत्तर प्रदेश रेगुलेशन ऑफ अर्बन प्रेमिसिस टेनेंसी एक्ट, 2021' को लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। पहले भारी फीस के कारण लोग कानूनी पचड़ों से बचने के लिए अनौपचारिक समझौते करते थे, जिनमें विवाद होने पर कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती थी। अब कम लागत के साथ, रेंटल ट्रांजेक्शन बैंकिंग और कानूनी सिस्टम के दायरे में आएंगे, जिससे इंस्टीट्यूशनल निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कोई 'रेंट कंट्रोल' उपाय नहीं है; किराए की दरें अभी भी मार्केट की डिमांड और सप्लाई पर ही तय होंगी। लेकिन इस बदलाव से यूपी के रेंटल और कमर्शियल लीजिंग सेक्टर में पारदर्शिता आएगी और विवाद कम होंगे। अब देखने वाली बात यह होगी कि कॉरपोरेट किरायेदार इस नई व्यवस्था को कितनी तेजी से अपनाते हैं।
