साल **2021** से **2026** के बीच भारत के **11** उभरते शहरों में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी की कीमतों में **63%** की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो टॉप मेट्रो शहरों की **42%** की ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। इंफ्रास्ट्रक्चर की सुधरी स्थिति इस तेजी के पीछे बड़ा कारण है, लेकिन निवेशकों को कम लिक्विडिटी और नौकरियों की अनिश्चितता जैसे जोखिमों को भी समझना होगा।
भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। Knight Frank और Confederation of Indian Industry (CII) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 11 उभरते हुए शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतें मेट्रो शहरों की तुलना में तेजी से बढ़ रही हैं। 2016 से 2026 के बीच इन उभरते बाजारों में 8% की सालाना दर (CAGR) से ग्रोथ हुई है, जबकि बड़े महानगरों में यह आंकड़ा सिर्फ 4% रहा है।
तेजी की असली वजह
चंडीगढ़, इंदौर, नागपुर, विशाखापत्तनम और कोच्चि जैसे शहरों में यह उछाल बेहतर कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से आया है। साल 2014 से अब तक देश में ऑपरेशनल एयरपोर्ट्स की संख्या 74 से बढ़कर 165 हो गई है। इसके अलावा, नेशनल हाईवे नेटवर्क का विस्तार 146,572 किलोमीटर तक पहुंच चुका है और मेट्रो रेल नेटवर्क 1,155 किलोमीटर से ज्यादा फैल गया है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
प्राइस एप्रिसिएशन के साथ-साथ कुछ बड़े जोखिम भी हैं। मेट्रो शहरों के मुकाबले, कई Tier-2 शहरों में मार्केट की गहराई कम है। सबसे बड़ी चुनौती 'लिक्विडिटी' की है। प्रॉपर्टी खरीदना तो आसान हो सकता है, लेकिन उसे जरूरत पड़ने पर सही दाम पर बेचना या अच्छा किराएदार ढूंढना बड़े शहरों के मुकाबले मुश्किल हो सकता है।
जॉब मार्केट ही आधार
सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर से प्रॉपर्टी की कीमत लंबे समय तक नहीं टिक सकती। सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां लोकल रोजगार और बिजनेस कितना बढ़ रहा है। नागपुर और इंदौर जैसे शहरों ने मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स में अच्छा काम किया है, लेकिन हर शहर की कहानी अलग है। निवेशकों को केवल शहर के औसत आंकड़ों पर न जाकर, स्पेसिफिक माइक्रो-मार्केट और वहां की जॉब क्रिएशन पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए।
