सुप्रीम कोर्ट ने Parsvnath Developers को घर खरीदारों का पूरा बकाया, **12%** सालाना ब्याज के साथ, एक हफ्ते के अंदर जमा करने का आदेश दिया है। अगर कंपनी ऐसा नहीं कर पाती है तो डायरेक्टर्स को जेल हो सकती है। यह फैसला गुरुग्राम के पारसनाथ एक्सोटिका प्रोजेक्ट में फ्लैट्स की देरी से डिलीवरी को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद के बाद आया है।
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पारसनाथ डेवलपर्स को सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सोमवार को रियल एस्टेट कंपनी पारसनाथ डेवलपर्स को घर खरीदारों के बकाये का भुगतान करने के लिए एक और और आखिरी मौका दिया है। कोर्ट ने कंपनी को एक हफ्ते का समय दिया है। इस दौरान कंपनी को घर खरीदारों की बकाया राशि, 12% सालाना ब्याज के साथ, कोर्ट के रजिस्ट्री में जमा करानी होगी। अगर कंपनी इस समय सीमा के अंदर यह पैसा जमा नहीं कर पाती है, तो कंपनी के डायरेक्टर्स को तुरंत जेल भेजा जा सकता है।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने कंपनी के बार-बार निर्देशों का पालन न करने के इतिहास पर गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि कंपनी के रवैये से उन परिवारों को भारी दुख हुआ है जिन्होंने सालों पहले अपने घर में निवेश किया था। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह न्याय प्रणाली का अनादर नहीं होने देगा और इसके लिए सख्त कदम उठाने को तैयार है, जिसमें जेल भेजना भी शामिल है।
कानूनी लड़ाई का बैकग्राउंड
यह कानूनी कार्रवाई उन निवेशकों के लिए सालों की हताशा का नतीजा है, जिन्होंने खासकर गुरुग्राम के पारसनाथ एक्सोटिका प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराए थे। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, खरीदारों ने 2013 में डिलीवर होने वाले फ्लैट्स के लिए बड़ी रकम का भुगतान किया था। प्रोजेक्ट शुरू होने के 20 साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी, कई खरीदारों को या तो उनके घर नहीं मिले हैं और न ही उनका पैसा वापस मिला है।
इस नए आदेश से पहले भी कोर्ट ने कंपनी के बैंक खातों को फ्रीज करने और उसके लीडरशिप के खिलाफ जमानती वारंट जारी करने जैसे कदम उठाए थे। कोर्ट ने पहले के आदेशों को भी बरकरार रखा है, जिसके तहत कंपनी को मामले के सुलझने तक प्रॉपर्टी पर तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने या फ्लैट्स का पज़ेशन ट्रांसफर करने से रोका गया था। बेंच ने विशेष रूप से इस बात का जिक्र किया कि कंपनी ने हरियाणा रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के पिछले आदेशों को भी नजरअंदाज किया था, जिसमें प्रभावित खरीदारों को मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।
वित्तीय और ऑपरेशनल दबाव
निवेशकों और मार्केट पर नजर रखने वालों के लिए, यह डेवलपमेंट कंपनी के सामने मौजूद गंभीर लिक्विडिटी (liquidity) और गवर्नेंस (governance) की चुनौतियों को दिखाता है। प्रोजेक्ट की कमिटमेंट्स को पूरा करने में लगातार विफलता के कारण कंपनी कई बार मुकदमेबाजी और रेगुलेटरी जांच के दायरे में आई है। कोर्ट का मौजूदा स्थिति की तुलना रियल एस्टेट की अन्य बड़ी फर्मों की पिछली दिवालियापन (insolvency) और कानूनी मुश्किलों से करना, पारसनाथ के मैनेजमेंट के लिए संभावित नतीजों की गंभीरता को दर्शाता है।
आगे की राह देखें तो, मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि क्या कंपनी सात दिनों की विंडो के अंदर जरूरी फंड्स जुटाकर जमा कर पाती है। निवेशक और स्टेकहोल्डर्स कंपनी की लिक्विडिटी स्थिति के बारे में किसी भी आगे के एक्सचेंज फाइलिंग पर भी नजर रखेंगे, क्योंकि इस डेडलाइन का नतीजा सीधे तौर पर उसके डायरेक्टर्स की कानूनी स्थिति और कंपनी की बाकी संपत्तियों के भविष्य को प्रभावित करेगा।
