दक्षिण भारत के बड़े रियल एस्टेट डेवलपर्स अब मुंबई के प्रॉपर्टी मार्केट में कदम रख रहे हैं। ये कंपनियां रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और पार्टनरशिप के जरिए इस सबसे महंगे शहर में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही हैं।
मुंबई में साउथ इंडियन डेवलपर्स की एंट्री
दक्षिण भारत के दिग्गज रियल एस्टेट डेवलपर्स मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन (MMR) में ज़ोर-शोर से दस्तक दे रहे हैं। ये कंपनियां शहर में हाई-वैल्यू रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और बढ़ती प्रॉपर्टी डिमांड को भुनाने की फिराक में हैं। Prestige Group, Shriram Properties, Puravankara, Sobha, Casagrand, और RMZ जैसी कंपनियां अपने पारंपरिक गढ़ों से बाहर निकलकर भारत के सबसे मजबूत प्रॉपर्टी मार्केट में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं।
पार्टनरशिप से बनाई अपनी राह
पहले के विपरीत, जब बाहर की कंपनियां बड़ी ज़मीन खरीदकर सीधे निवेश करती थीं, अब ये साउथ इंडियन डेवलपर्स पैसे बचाने वाले मॉडल अपना रहे हैं। इनमें जॉइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट और लोकल ज़मीन मालिकों के साथ स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप शामिल हैं। इस तरीके से वे ज़मीन खरीदने पर तुरंत होने वाले बड़े खर्च से बचते हुए प्राइम लोकेशंस पर प्रोजेक्ट्स शुरू कर पा रहे हैं। मुंबई के जटिल नियमों और बिखरी हुई ज़मीन की मालिकाना हक वाली दिक्कतों से निपटने के लिए यह तरीका काफी कारगर साबित हो रहा है।
प्रेस्टीज ग्रुप का दमदार प्रदर्शन
Prestige Group ने मुंबई में पहले ही अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। कंपनी ने 16 प्रोजेक्ट्स से ₹16,000 करोड़ से ज़्यादा की कमाई की है, जिनका कुल एरिया 1.65 करोड़ स्क्वायर फीट से ज़्यादा है। कंपनी का कहना है कि मुंबई का बिजनेस इकोसिस्टम और चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट उनके लिए बड़े आकर्षण का केंद्र हैं। Shriram Properties जैसी कंपनियों के लिए, पुणे जैसे शहरों में मिली सफलता, मुंबई में प्रोजेक्ट्स को संभालने के लिए एक रोडमैप तैयार कर रही है।
मुंबई ही क्यों?
रियल एस्टेट इंडस्ट्री में RERA (रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी) के लागू होने के बाद से काफी कंसॉलिडेशन हुआ है। कड़े फाइनेंसिंग नियम और ब्रांडेड डेवलपर्स की तरफ ग्राहकों का बढ़ता झुकाव, मजबूत बैलेंस शीट और अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड रखने वाली कंपनियों के लिए नए मौके लेकर आया है। दक्षिण भारतीय डेवलपर्स के लिए मुंबई में विस्तार करना अपने बिजनेस को भौगोलिक रूप से डाइवर्सिफाई करने की एक ज़रूरी रणनीति है। इससे वे अपने घरेलू बाजारों में बढ़ती ज़मीन की कीमतों और कड़ी प्रतिस्पर्धा के जोखिम को कम कर सकते हैं।
मार्केट के जोखिम और चुनौतियां
मुंबई एक मुश्किल बाजार बना हुआ है, जहाँ के नियम-कानून जटिल हैं और प्रोजेक्ट्स में एग्जीक्यूशन का जोखिम ज़्यादा है। रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में मौजूदा निवासियों के साथ तालमेल बिठाना और पुरानी बिल्डिंग की संरचना को संभालना एक बड़ी चुनौती होती है, जिसके कारण अक्सर प्रोजेक्ट्स में देरी हो जाती है। भले ही व्यवस्थित खिलाड़ियों को कैपिटल आसानी से मिल जाता है, लेकिन इन प्रोजेक्ट्स की असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे लोकल साइट एग्जीक्यूशन और प्रोजेक्ट टाइमलाइन को कितनी कुशलता से मैनेज करते हैं। इन डेवलपर्स पर नज़र रखने वाले निवेशक नए प्रोजेक्ट लॉन्च की रफ़्तार और यह देख सकते हैं कि ये कंपनियां अपने घरेलू बाजारों में कर्ज के स्तर को बनाए रखते हुए अपने विस्तार खर्च को कितनी प्रभावी ढंग से संतुलित कर पाती हैं।
